भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 222 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

महायोगज्ञान से सम्पन्न सद्गुरु की शरणागति से योगसाधक अपने हृदय में मूलतत्व—अलखनिरंजन के स्वरूप का विचार करता है । इसके परिणामस्वरूप उसका संशय ( व्यामोह ) नष्ट हो जाता है । आसनमिति स्वस्वरूपे समासन्नता स्वस्तिकासनं पद्मासनं सिद्धासनमेतेषां मध्ये यथेष्टमेकं विधाय सावधानेन स्थातव्यम् । इत्यासनलक्षणम् ॥ ३४ ॥ अपने ( स्वसंवेद्य, द्वैताद्वैतविवर्जित परमात्म ) स्वरूप में चेतना की संस्थिति अथवा स्थापन ( समासन्नता ) ही आसन है । स्वस्तिकासन, पद्मासन, सिद्धासन -- इन तीनों में से एक आसन में ( योगयुक्ति की ) विधि से सावधान होकर ( ध्येय तत्व में ) स्थिर हो जाना, ठहर जाना ही आसन का लक्षण है ॥ ३४ ॥ विशेष—महायोगी गोरखनाथजी की दृष्टि में यद्यपि वाह्य आसनाभ्यास का विशेष महत्व नहीं है, तथापि उन्होंने साधना में संतुष्टि के लिये आसनों की दिशा में स्वस्तिकासन, पद्मासन और सिद्धासन को वरीयता प्रदान की है । उन्होंने कहा है । आसण दिढ़ अहार दिढ़ जे न्यंद्रा दिढ़ होई । गोरष कहै सुणौ रे पूता मरै न बूढ़ा होई ॥ ( गोरखबानी सबदी १२५ ) महर्षि पतञ्जलि ने सुखपूर्वक बैठने को आसन कहा है । शरीर को सीधा और स्थिर कर सुखपूर्वक बैठ कर समस्त चेष्टा के त्यागपूर्वक प्रयत्न के शैथिल्य और अनन्त अलखनिरञ्जन परमात्मा में मन को प्रवृत्त करने से ही आसन की सिद्धि होती है और साधक द्वन्द्वों से विमुक्त होकर स्वरूप ( सुख ) में समासन्न हो उठता है । 'स्थिरसुखमासनम्' ( योगदर्शन २ । ४६ ) महर्षि पतञ्जलि और महायोगी गोरखनाथ की शब्दावली 'स्थिरसुख मासनम्' और 'स्वस्वरूपे समासन्नता' में योगासनों के अभ्यास की फलदृष्टि में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७३