सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतादात्म्य परिलक्षित है । उपर्युक्त ( पातञ्जल सूत्र २ । ४६ ) के व्यासभाष्य और भोजवृत्ति में भी परमात्मा में चित्त की तदाकारता ही स्वरूपसमासन्नता का प्रतिपादन है । व्यासभाष्य में संकेत है :- अनन्ते वा समापन्नं चित्तमासनं निर्वर्तयतीति । अनन्त में समापन्न चित्त आसन को सिद्धि करता है । भोजवृत्ति में यही बात उपलक्षित है । यदा चाकाशादिगत आनन्त्ये चेतसः समापत्तिः क्रियतेऽव्यव- धानेन तादात्म्यमापद्यते तदा देहाहंकाराभावान्नासनं दुःखजनकं भवति । जब आकाश आदि में रहनेवाली अनन्तता में चित्त व्यवधानरहित तदाकार किया जाता है, तब उसकी तद्रूपता प्राप्त हो जाने पर शरीराभिमान का अभाव हो जाने से देह की सुधि न रहने से आसन दुःख का उत्पादक नहीं होता । यही स्वरूप में समासन्नता का विशिष्ट फल है । जानु और ऊरु ( जंघाओं ) के मध्य में पैरों के तलवों को अच्छी तरह लगाकर समान अवस्था में शरीर को एकसोध में कर बैठना ही स्वस्तिक आसन है । जानूर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे । ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत् प्रचक्षते ॥ ( हठयोगप्रदीपिका १ । २१ ) इस आसन के द्वारा योगाभ्यासी वायु का साधन यथाशीघ्र करने में सफल होता है । राजयोग-साधना में इसे बहुत उपयोगी कहा गया है, इस आसन में मन स्थिर होता है, साधक को ध्यान में सुविधा होती है, रीढ़ की स्थिरता बनी रहती है, वीर्य उर्ध्वमुखी होता है, ब्रह्मचर्य की शक्ति बढ़ती है । भगवान् शिव का कथन है । सुखासनमिदं प्रोक्तं सर्वदुःखप्रणाशनम् । स्वस्तिकं योगिभिर्गोप्यं स्वस्तीकरणमुत्तमम् ॥ ( शिवसंहिता ३ । ११८ ) ७४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति