सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहर्षि घेरण्ड ने ध्यान के तीन भेद बताये हैं। पहला स्थूल ध्यान है, दूसरा ज्योतिर्ध्यान है और तीसरा सूक्ष्मध्यान है। जिस ध्यान में मूर्ति, इष्टदेव अथवा गुरु का चिन्तन हो, वह स्थूल ध्यान है, जिसमें तेजोमय ब्रह्म या शक्ति की भावना हो वह ज्योतिर्ध्यान है, जिसमें विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डलिनी का ध्यान हो, वह सूक्ष्म ध्यान है। स्थूलं ज्योतिस्तथा सूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः। स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा। सूक्ष्मं विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डली परदेवता ॥ (घेरण्डसंहिता ६।१) भ्रूमध्य में और मन के ऊर्ध्व भाग में ॐकारमय शिखामालायुक्त ज्योति का ध्यान ही ज्योतिर्ध्यान अथवा तेजो ध्यान है। शाम्भवी मुद्रा के अभ्यास द्वारा कुण्डलिनी महाशक्ति का ध्यान सूक्ष्म ध्यान है। महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि योगी के हृदय में विद्यमान आत्मवस्तु का निश्चल चिन्तन ही ध्यान है। सगुण ध्यान, निर्गुण ध्यान के रूप में ध्यान के दो प्रकार हैं। सर्वं चिन्तासमावर्ति योगिनो हृदि वर्तते। या तत्वे निश्चला चिन्ता तद्धि ध्यानं प्रचक्षते ॥ द्विधा भवति तद्ध्यानं सगुणं निर्गुणं तथा। सगुणं वर्णभेदेन निर्गुणं केवलं विदुः॥ (विवेकमार्तण्ड १६५-१६६) गुणमात्रोपलक्षित वर्णपद सगुण ध्यान का विषय है। शुद्धचैतन्यविषयक ध्यान निर्गुणं ध्यान है। निर्गुणं ध्यान का फल समाधि है। निर्गुणध्यानयुक्तस्य समाधिश्च ततो भवेत्। (योगतत्त्वोपनिषद्) ध्यानयोग के द्वारा साधक आत्मसाक्षात्कार में समर्थ होता है। साधक को भावना करनी चाहिये कि— सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८७