भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ ( श्वेताश्वतर० ६ । १९ ) मैं कलाओं से रहित, क्रियारहित, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, अमृत के परमसेतु, जले इन्धन से युक्त अग्नि की भाँति ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का चिन्तन करता हूँ । यही योगसाधक के लिये निराकार आत्मस्वरूप के ध्यान का गोरखनाथ जी द्वारा भी निर्दिष्ट क्रम है । अथ समाधिलक्षणं सर्वतत्त्वानां समावस्था निरुद्यमत्व मनायासस्थितिमत्त्वमिति समाधिलक्षणम् । इत्यष्टाङ्गयोग- लक्षणम् ॥ ३६ ॥ समाधि के लक्षण का निरूपण किया जाता है । समस्त तत्त्वों की समावस्था- गत अनायास, स्वाभाविक ( सहज ) स्थिति ही समाधि का लक्षण है । ( इस वर्णन में समाधिसिद्धि राजयोग परिलक्षित है । ) इस तरह अष्टांगयोग के लक्षण का निरूपण-वर्णन किया गया ॥ ३६ ॥ विशेष—समस्त तत्त्वों की समावस्था का आशय है तत्त्वों की अभेदरूपता— आत्मस्वरूप में विद्यमानता । इस समावस्था में सहज प्रतिष्ठा ही समाधि ( राजयोग ) की सिद्धि है । यही उन्मनी अथवा सहजावस्था है । समाधि के दो रूप हैं—पहला सविकल्प ( सबीज अथवा सम्प्रज्ञात ) समाधि है; दूसरा निर्विकल्प ( निर्बीज अथवा असम्प्रज्ञात ) समाधि है । जब तक ध्याता, ध्येय और ध्यान—इन तीनों का साधक को प्रतिभास होता है, तब तक सम्प्रज्ञात समाधि है और ध्याता और ध्यान ध्येय में समाहित--आकारित हो जाते हैं, तब निर्विकल्प समाधि की अवस्था समझनी चाहिये । इस समाधि की सिद्धि होने पर योगी को बिना परिश्रम के ही सहज रूप से जाग्रत् अवस्था में भी समाधि लगी रहती है, सर्वत्र उसकी चित्तवृत्ति आत्माकारित हो उठती है, । उन्मनी समाधि के परे की अवस्था शून्य है, योगसिद्ध पुरुष को स्वरूप में स्थिति का फल शून्य समाधि है । शून्य समाधि में परिचय (आत्मस्वरूप ज्ञान अथवा स्वरूपवोध) से अटल पद—शाश्वत सनातन पद में स्थैर्य्य की प्राप्ति होती है । ८८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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