भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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तीसरा उपदेश [ पिण्डसंवित्ति ] पिण्डमध्ये चराचरं यो जानाति स योगी पिण्डसंवित्ति- र्भवति ॥ १ ॥ ( पिण्डविचार के उपरान्त उसके फलस्वरूप पिण्डज्ञान का उपदेश किया जाता है। यद्यपि हाड़मांसरक्तमज्जामेदादि से गठित व्यष्टिपिण्ड प्रत्यक्ष है और इस सम्बन्ध में इसका निरूपण असंगत-सा है तथापि इसमें चराचर समस्त ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है, इसलिये पिण्डज्ञान-निरूपण का फल है पिण्ड में व्याप्त समस्त ब्रह्माण्ड की परिचयप्राप्ति जो योगी इस पिण्ड में चर, अचर, समस्त ब्रह्माण्ड का ज्ञान प्राप्त करता है, वह पिण्डसंवित्ति ( पिण्डज्ञानी ) हो जाता है । योगी पिण्ड ( समष्टि-व्यष्टि पिण्ड ) का ज्ञानी हो जाता है ॥ १ ॥ विशेष—व्यष्टि पिण्ड ( शरीर में अस्मदादि अन्तःकरणाभिमानी जीव ( -आत्मा ) है और समष्टि पिण्ड में विराट् हिरण्यगर्भादि ( परमात्मा ) परिव्याप्त हैं। समष्टिपिण्ड व्यापक, अधिक शक्तिशाली है, सर्वेश्वर सत्यसंकल्प होने से अस्मदादि शरीरों का कारण और नियन्ता है, व्यष्टि पिण्ड ( शरीर ) विनाशी है, क्षणभंगुर है, उसका अभिमानी जीव कर्मपाश से आबद्ध है । योग- साधक ब्रह्माण्डगत कार्य-व्यवहार का ज्ञान अपने व्यष्टि पिण्ड में प्राप्त कर, कर्मपाश से मुक्त होकर परमशान्त और सच्चिदानन्दरूप आदिनाथ, अलख निरञ्जन परमेश्वर के स्वरूप का बोध प्राप्त कर तदाकार हो जाता है । ६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति