भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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सप्त पाताल तथा अनेक लोकादि कूर्मः पादतले वसति पातालं पादाङ्गुष्ठे तलातलमङ्गुष्ठाग्रे महातलं पादपृष्ठे रसातलं गुल्फं सुतलं जङ्घायां वितलं जान्वोर- तलमूर्वोरैव सप्तपातालं रुद्रदेवाधिपतये तिष्ठति पिण्डमध्ये क्रोध- रूपी भावः स एव कालाग्निरुद्रः ॥ २ ॥ कूर्म पैर के नीचे ( पादतल में ) व्यष्टि शरीर के आश्रय के रूप में स्थित है ( जिस तरह कूर्म--शिवशक्ति की आत्माभिव्यक्ति का एक रूप ब्रह्माण्ड-शरीर का आश्रय है ) । नीचे के सात लोक-सप्तपाताल हमारे व्यष्टि-शरीर में स्थित हैं । पैर के अँगूठे में पाताल, अँगूठे के अग्रभाग में तलातल, पादपृष्ठ में रसातल गट्टे ( गुल्फ ) में सुतल, जाँघ में वितल और जानु में अतल स्थित है। इन सातों पाताल के अधिष्ठातृ देवता रुद्र हैं । पिण्ड में क्रोधरूपी भाव ही कालाग्निरुद्र है । रुद्र व्यष्टि पिण्ड ( शरीर ) में क्रोध के रूप में निवास करता है ॥ २ ॥ विशेष-योगी का लक्ष्य एक आत्मा--अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविवर्जित परमात्मा को समस्त प्रकार के शरीरों में देखना और समस्त प्रापंचिक सत्ताओं के मौलिक आध्यात्मिक स्वरूप को पहचानना है । यही समस्त पिण्डों, प्रापंचिक सत्ताओं तथा ब्रह्माण्ड-व्यस्था का सच्चा ज्ञान है । जब योग-साधक की व्यावहारिक चेतना यथेष्ट शुद्ध और आलोकित हो जाती है, तब पूर्ण का प्रत्येक अंश में अनुभव किया जाता है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का प्रत्येक व्यष्टि-पिण्ड में अनुभव किया जाता है तथा समस्त व्यष्टि-शरीरों की मौलिक एकता स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाती है । जो योगसाधक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का व्यष्टि-शरीर में अनुभव करता है, वही शरीर का सच्चा ज्ञाता है । निर्वाण--परम कैवल्य पद की प्राप्ति अपने शरीर में ही प्रत्यक्ष है । उस निर्वाण-पद की खोज काया में करनी चाहिये, ऐसा गोरखनाथजी का ज्ञानोपदेश है । जोग जुक्त जब पावै ग्यांना । काया खोजै पद निरबाना ॥ सप्तदीप नवखंड ब्रह्माण्डा । धरती आकास देवा रवि चंदा ॥ तजिवा तिहुँ लोक निवासा । तहाँ निरंजन जोति प्रकासा ॥ ( गोरखवानी-प्राणसंकली २-३ ) सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६३