सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन ), नौ ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु ( बृहस्पति ), शुक्र, शनि, राहु, केतु ), पन्द्रह तिथि ( प्रतिपदा आदि )—ये सब शरीरस्थ मांस-पेशियों—बहत्तर हजार कोठों में निवास करते हैं। तारामण्डल हड्डियों में अथवा भूख-प्यास रूपी ऊर्मियों में स्थित है। तैंतीस करोड़ देवता असंख्य रोम-छिद्रों में निवास करते हैं। दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत-प्रेत हड्डियों के जोड़ों में बसते हैं। अनेक पीठ-उपपीठ रोमछिद्रों में स्थित हैं। पेट के बालों में अनेक दूसरे पर्वत हैं। गन्धर्व, किन्नर, किंपुरुष, अप्सरायें उदर में निवास करते हैं। स्वेच्छा से आकाश में विहार करने वाली उग्रदेवता लीलारूप मातृ-शक्तियाँ वायु के वेग में स्थित हैं तथा मेघ अश्रुपात में निवास करते हैं। अनन्त सिद्ध बुद्धि के प्रकाश में रहते हैं। दोनों नेत्रों में ( बायें में ) चन्द्रमा और सूर्य ( दायें नेत्र में ) निवास करते हैं। अनेक वृक्षलतागुल्मतृण जांघ के रोमों में स्थित हैं। अनेक कृमि-कीट-पतंग विष्ठा में रहते हैं ॥ १२ ॥ स्वर्ग-नरक, मुक्ति यत्सुखं तत्स्वर्गं, यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्मतद्बन्धनं यन्नि- र्विकल्पं तन्मुक्तिः स्वरूपदशायां निद्रादौ स्वात्मजागरः शान्तिर्भवति। एवं सर्वदेहेषु विश्वरूपपरमेश्वरः परमात्मा- ऽखण्डस्वभावेन घटे घटे चित्स्वरूपो तिष्ठति। एवं पिण्ड- संवित्तिर्भवति ॥ १३ ॥ युक्ताहारविहारयुक्त संयमित जीवन ही शरीर का सुख है—यही स्वर्ग ( की भावना ) है, असंयमित तथा आहारविहारव्यतिक्रमजन्य रोगाक्रान्त अवस्था ही दुःख है, यही नरक ( की भावना ) है। अपने संकल्प की पूर्ति के रूप में फल- प्राप्ति की भावना से किये गये ( सकाम ) कर्म ही बन्धन हैं और संकल्पशून्य इच्छारहित सहज-स्वाभाविक अवस्था ही निर्विकल्पता है, यही मुक्ति अथवा स्वरूपस्थिति एवं कैवल्य है। यद्यपि अज्ञानी की दृष्टि में निद्रादिरूपता ही स्वरूपस्थिति कही गयी है तथापि यह शुद्ध-बुद्ध आत्मबोधरूप प्रपंचातीत अवस्था ही आत्मजागृति है, इससे शान्ति प्राप्त होती है, यही जीवन्मुक्ति है। इस तरह सभी देहों में विश्वरूप परमात्मा—परमेश्वर अखण्डस्वरूप घट-घट में चिद्रूप व्याप्त है—ऐसा जाननेवाला ही पिण्डसंवित्ति योगी होता है ॥ १३ ॥ इतिश्रीगोरक्षरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ तृतीयोपदेशः ॥ 卐 १०२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति