सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा उपदेश [ पिण्डाधार ] अस्ति काचिदपरंपरा संवित्स्वरूपा सर्वपिण्डाधारत्वेन नित्यप्रबुद्धा निजाशक्तिः प्रसिद्धा कार्यकारणकर्तॄणामुत्थान- दशाङ्कुरोन्मीलनेन कर्त्तारं करोतीत्यनन्तरावाधारशक्तिरिति कथ्यते । अत्यन्तनिजप्रकाशस्वसंवेद्यानुभवैकगम्यमाना शास्त्र- लौकिकसाक्षात्कारसाक्षिणी सा परा चिद्रूपिणी शक्तिर्गीयते । सैव शक्तिर्यदा सहजेन स्वस्मिन्नुन्मीलन्त्यां निरुत्थानदशायां वर्तते तदा शिवः स एव भवति ॥ १ ॥ ( इस चौथे उपदेश में महायोगी गोरखनाथ ने शिवशक्ति के सामरस्य की स्थिति की प्रस्तावना निरूपित की है। निजाशक्तिसंयुक्त परासंवित् का विवेचन किया गया है। जीव का शिवशक्ति में भेदाभाव--अभिन्नता ही सामरस्य है। यही मोक्ष अथवा परमकैवल्य-स्वरूपावस्थान है। किस प्रकार यह समरसता स्थापित होती है--इसी का चौथे उपदेश में वर्णन है। यह शक्ति स्वसंवेद्य, परमशिव से अभिन्न, सम्पूर्ण स्वतन्त्र, कूटस्थ, संवित्स्वरूपा, नित्य प्रबुद्ध निजाशक्ति है। यह विनाशरहित, समस्त जगत् की आधारस्वरूपा आद्या भवानी है, यह बुद्धि आदि के अनित्य प्रकाश से भिन्न नित्य प्रकाशरूपा है, यह शक्ति शरीर आदि कार्य तथा उनके पाँच सूक्ष्म करण और जीव की अभिव्यक्तिरूपी अवस्था के अंकुर के प्रकाश से समस्त विश्व के कर्ता हिरण्यगर्भादि को भी उत्पन्न करती है। यह शक्ति शिवकी अत्यन्त अन्तरंग है, भौतिक प्रपंच की अपेक्षा सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०३