भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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आधार कहलाती है, अनुभव से ही गम्य है, यह सबका उपादान कारण है। लोक- सम्बन्धी तथा बुद्धिवृत्ति को देखनेवाली चिद्रूप शक्ति ही पराशक्ति है। जब प्रलयकाल में स्वभाव से यह विकसित-उन्मीलित होती है, तब वह अपने शुद्ध रूप में शिवस्वरूपिणी हो जाती है। इस अवस्था में शिवशक्ति में सम्पूर्ण तादात्म्य रहता है ॥ १ ॥ विशेष—गोरखनाथजी की योगानुभूति है कि स्वतः प्रकाशित, स्वतः सत्, स्वतः पूर्ण, अनन्त और शाश्वत चेतना, काल-दिक्-सापेक्षिता से परे परम सत्ता है। यह स्वयं को काल-दिक्-आश्रित जगत्-व्यवस्था के रूप में प्रकट करती है। स्वयं को इस व्यावहारिक-नानारूपात्मक जगत्-व्यवस्था के रूप में अभिव्यक्त करने पर भी यह चरम सत्ता अपनी पारमार्थिक एकता और पूर्णता में स्वस्थ—लीन अथवा कूटस्थ रहती है। यही परमशिवस्वरूपिणी परासंवित्—निजा शक्ति है। कुलाकुलसामरस्य अतएव कुलाकुलस्वरूपा सामरस्यनिजभूमिका निगद्यते ॥ २ ॥ यह कुलाकुलस्वरूपिणी पराशक्ति कुलाकुल शिवशक्ति की अभेदावस्था ही सामरस्य-प्राप्ति की दिशा में निरूपित की जाती है ॥ २ ॥ कुलशक्ति कुलमिति परा सत्ताऽहंता स्फुरता कलास्वरूपेण सैव पञ्चधा विश्वस्याधारत्वेन तिष्ठति ॥ ३ ॥ कुलशक्ति परा, सत्ता, अहंता, स्फुरता और कला, पाँच रूपों में समस्त विश्व के आधार—आश्रयरूप में अभिव्यक्त है ॥ ३ ॥ अतएव परापरा निराभासावभासकान् प्रकाशस्वरूपा या सा परा ॥ ४ ॥ यह कुलशक्ति समस्त विश्व के आधार के रूप में पराऽपरा—सभी वस्तुओं में विद्यमान है। यह चेतन प्रकाशस्वरूप है। अपनी सत्ता से सबकी प्रकाशिका होने से यह परा शक्ति है ॥ ४ ॥ १०४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति