भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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( भाव, अभाव, शून्य-अशून्य द्वैत-अद्वैत, सृष्टिसृजनलयात्मक विश्वप्रपञ्च आदि समस्त स्थावर-जंगम में एकमात्र परमात्मा—परमेश्वर शिव ही कुल- अकुल रूप में अभिव्यक्त हैं । शिव से अभिन्न शक्ति ही महाप्रलय में अकुला- वस्थायुक्त कहलाती है। उस समय नामरूपात्मक विश्वप्रपंचका उपसंहार कर परमतत्व शिव में अभिन्न हो उठती है। सृष्टि का समय आने पर यही निजा शक्ति प्राणियोंके कर्म के साथ युक्त होकर परा-अपरा-सूक्ष्म आदि भेद से कुलरूप व्यक्त अवस्था धारण करती है । विश्वका सृजन करती है, इस अवस्था में यह कुल कहलाती है। वह एकमात्र परमतत्व शिव की आकृति है—न वह द्वैत ( कुल ) है, न वह अद्वैत ( अकुल ) है । जिस तरह जल के बुलबुले जलस्वरूप ही हैं, उसी न्याय से कुल-अकुल शक्ति . शिव है । द्वैत-अद्वैत से रहित यह अभेद ही सामरस्य है ॥ ११ ॥ विशेष :—यह परा शक्ति प्रापंचिक द्वैतताओंका आधार, कारण और पोषक है, यही अपने मूल स्वतः प्रकाश शिवके पारमार्थिक स्वरूप में विराजने पर शिव में तादात्म्य में प्रतिष्ठित अथवा अभिव्यक्त हो उठती है। इस तरह यह पराशक्ति शिव के व्यक्त ( कुल ) और ( अकुल ) अव्यक्त स्वरूपोंका का सामरस्य प्रतिपादित करती है। यह पराशक्ति ही निजा शक्ति है। कुलरूप में अकुल, मुक्त रूप से स्वयं को प्रापंचिक स्तर पर अभिव्यक्त कर स्वनिर्मित सीमाओं में आनन्द-विहार करता है और अपने अकुल रूप में वह शाश्वत, सत्-आनन्दमय, अभिन्न पारमार्थिक आत्मारूप में प्रकाशित रहता है। लौकिक-प्रापंचिक आत्मा- भिव्यक्तिसे निलिप्त और परे होता है। यह निजा शक्ति शिवकी पारमार्थिक एवं सक्रिय रूप में अभेदता-समरसता स्थापित करती है । अतएवैकाकारोऽनन्तशक्तिमान् निजानन्दतयावस्थितोऽपि नानाकारत्वेन विलसन् स्वप्रतिष्ठां स्वयमेव भजतीति व्यवहारः। अलुप्तशक्तिमान्नित्यं सर्वाकारतया स्फुरन्पुनः स्वेनैव रूपेण एकएवावशिष्यते ॥ १२ ॥ अनन्त शक्तिमान् अतएव द्वैत-अद्वैत रूप में एकाकार परब्रह्म परमेश्वर ( समरसता के फलस्वरूप ) अनन्त शक्तिमान्, परिपूर्ण रूप से अखण्डानन्दस्वरूप अनेक रूपों में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०७