भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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( मायिक दृष्टि से भासमान ) स्वाश्रय में अभिव्यक्त है, यद्यपि लोक-व्यवहार की दृष्टि से वह अनेक रूपों में प्रतीत होता है, तथापि वही सब का आधार है। शिव और शक्ति का नित्य तादात्म्य सम्बन्ध है। उससे शक्ति के तादात्म्य का कभी लोप ही नहीं है। जड़-चेतन-स्थावर, जंगमादि समस्त संसाररूप से भी वह समुद्र के फेन, तरंगादि के समान व्यावहारिक प्रपंचावस्था से भास- मान होता है और फिर अन्त में वही परमेश्वर निज व्यापक, चिद्रूप, अखण्ड स्वरूप में अवशेष ( पूर्ण ) रहता है ॥ १२ ॥ विशेष—अपनी अनन्त शक्ति से युक्त शिव तात्विक रूप में अपने पूर्ण आनन्दमय, अभेद, अपरिवर्तनीय स्वरूप में रहते हुए भी विलासरूप में अपने को विभिन्न रूपों में प्रकट करते हैं और भोगते हैं। इस प्रकार व्यावहारिक रूप में वे भोक्ता और भोग्य, स्रष्टा और सृष्टि, आधार और आधेय, आत्मा और उसकी अभिव्यक्ति आदि दोहरे रूप में भासित होते हैं। न तो वे शक्ति का कभी त्याग करते हैं और न शक्ति उनका त्याग करती है। अलुप्त शक्तिमान् और नित्य कहलाने का स्वारस्य है। यद्यपि शिव शक्ति के द्वारा शाश्वत रूप से अपने आप को समस्त रूपाकारों में व्यक्त करते हैं तथापि वे अनादि काल से आत्मस्वरूप में अद्वैत, परिवर्तनरहित, अभेदसत्ता, निराकार, निरञ्जन परमात्मा के रूप में नित्य अभिव्यक्त रहते हैं। अतएव परमकारणं परमेश्वरः परात्परः शिवः स्वस्वरूपतया सर्वतोमुखः सर्वाकारतया स्फुरितुं शक्नोतीत्यतः शक्तिमान्, शिवोऽपि शक्तिरहितः शक्तः कर्तुं न किञ्चन । स्वशक्त्यासहितः सोऽपि सर्वस्याभासको भवेत् ॥ १३ ॥ अतएव सर्वशक्तिसम्पन्न होने से ही आदिनाथ शिव सूक्ष्म-स्थूल, समस्त भौतिक पदार्थों के परम कारण परमेश्वर हैं। वे अपने स्वरूप में परात्पर हैं, चैतन्यस्वरूप सब में व्यापक हैं, रुद्र-विष्णु आदि रूपों में अवतरित होने में समर्थ हैं। शक्तियुक्त होने पर ही शिव सर्वसमर्थ हैं, शक्तिरहित होने पर वे कुछ भी करने में समर्थ नहीं हैं। अपनी निज शक्ति से युक्त होने पर ही वे विश्व के साक्षी हैं ॥ १३ ॥ विशेष—परात्पर शिव ( उच्चतम प्रापंचिक सत्ताओं एवं काल, दिक् तथा क्रिया से परे ) अपनी अनन्त शक्ति के द्वारा व्यावहारिक जगत् के समस्त १०८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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