भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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स्तरों के अंतिम कारण परमेश्वर तथा सर्वद्रष्टा हो जाते हैं । उनका पारमार्थिक स्वतः प्रकाश, आत्मपूर्ण स्वरूप इस जगद्व्यवस्था से किसी भी तरह प्रभावित हुए बिना ही समस्त लौकिक सत्ताओं के रूप में विभासित रहता है । अतएवानन्तशक्तिमान् परमेश्वरः स विश्वरूपीविश्वमयो भवतीति प्रसिद्धं सिद्धानां च परापरस्वरूपा कुण्डलिनी वर्तते । अतस्ते पिण्डसिद्धाः प्रसिद्धा सा कुण्डलिनी प्रबुद्धा अप्रबुद्धा चेति द्विधा । अप्रबुद्धेति तत्रपिण्डचेतनरूपा स्वभावेन नानाचिन्ताव्यापारोद्यमप्रपञ्चरूपा कुटिलस्वभावा कुण्डलिनी रव्याता सैव योगिनां तत्तद्विलसित विकाराणां निवारणो- द्यमस्वरूपा कुण्डलिन्यूर्ध्वगामिनी प्रसिद्धा भवति ॥ १४ ॥ परापरशक्ति से युक्त परमेश्वर अनन्त शक्तिमान् कहा जाता है । वह समस्त विश्व का अधिष्ठातारूप आधार होने से विश्वरूप और विश्वमय कहा जाता है । परापरस्वरूपा शक्ति कुण्डलिनी सिद्धों के देहपिण्ड में विद्यमान है, उस कुण्डलिनीके बल अथवा प्रभाव से वे कायसिद्ध के रूप में प्रसिद्ध हैं । यह कुण्डलिनी प्रबुद्ध और अप्रबुद्ध (सुप्त )--दो प्रकार की है । यद्यपि देहपिण्ड में विद्यमान कुण्डलिनी स्वभाव से चेतनस्वरूप है, तथापि जब तक वह जगायी नहीं जाती है, तब तक वह संसारी पुरुषोंके लिये अनेक शोकमोहचिन्ताव्यापार- रूपिणी है--बन्धनकारिणी है, वही मूलाधार में कुटिल--अधोमुखी ( सुप्त ) रहती है, पर वही जगायी जाने पर सहस्रदल तक ऊर्ध्वगामिनी होती है तथा योगियों के मनोविकारों का निवारण करती है ॥ १४ ॥ विशेष—अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध कुण्डलिनी के स्वरूप का महायोगी गोरखनाथ ने गोरक्षशतक आदि में विस्तार से विचार किया है। अन्य योगसंहिताओं में इसका विशिष्ट निरूपण उपलब्ध होता है । गोरखनाथजी का कथन है कि मेढ्र के ऊपर और नाभि के नीचे कन्द के समान सभी नाड़ियों का उत्पत्ति-स्थान है । कन्द के ऊपर कुण्डलिनीशक्ति आठ प्रकार की होकर कुण्डलित आकार में सुषुम्ना में स्थित पश्चिमद्वार—ब्रह्मद्वार को अपने मुख से आच्छादित कर स्थित है । इस तरह जिस द्वार से ऊर्ध्व की ओर गति करते हुए योगसाधक द्वारा निर्मल, निर्विकार, ब्रह्मरन्ध्र—ब्रह्मस्थान में प्रवेश किया जाता है, उसी द्वार को रोक, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०६