सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविशेष --साधक योनिस्थान --गुदा और मेढ्र के मध्य भाग के स्थान को किसी भी पैर की एड़ी से दवा कर गुदा को सिकोड़े और फैलाये तथा अपान वायु को ऊपर की ओर खींचे । यही मूलवन्ध है । जिससे नीचे की ओर गतिशील अपानवायु को साधक सुपुम्ना में प्रवाहित करता है अथवा ऊपर की ओर उठाता है, वही मूलवन्ध है । जिस बन्ध से प्राण उड़कर सुपुम्ना नाड़ी में पहुँच जाता है, वही उड्डियानवन्ध है । नाभि के ऊपर और नीचे उदर में पीछे की ओर इस तरह आकर्षण करे कि दोनों भाग पीठ तक—पीछे पहुँच जाय । कम-से कम इस तरह तीन वार आकर्षण करना चाहिये । कंठ ( गले के विवर ) को सिकोड़ कर साधक को हृदय-देश में-- वक्ष के समीप चार अंगुल की दूरी पर ठोड़ी को दृढ़ता से स्थापित करना चाहिये । यही जालन्धरवन्ध है । इन तीनों वन्धों के अभ्यास से कुण्डलिनी महाशक्ति क्रमशः सहस्रार में पहुँच जाती है । यस्माच्चराचरं जगदिदं चिदचिदात्मकं प्रभवति तदेव मूलाधारं संवित्प्रसरं प्रसिद्धम् ॥ १६ ॥ जिससे चर-अचर, स्थावर-जंगम, चिद्, अचिद् समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है, वह मूलाधार है, जिसके संकोच और प्रसरण से कुण्डलिनी का प्रबोधन होने पर ज्ञान की वृद्धि होती है—यह मूलाधार ही संवित्प्रसारण-भूमि है ॥ १९ ॥ सर्वशक्तिप्रसरसंकोचाभ्यां जगत्सृष्टिः संहृतिश्चभवत्येव न सन्देहस्तस्मात्सा मूलमित्युच्यते । अतः प्रायेण सर्वे सिद्धा मूलाधाररता भवन्ति ॥ २० ॥ समष्टिरूप ( सर्वेश्वरी ) महाशक्ति के व्यापार—कार्य से ही ( संकोच और प्रसरण से ही ) जगत् का सृजन और संहार होता है, इसमें संदेह नहीं है ( कि योगी इस मूल शक्ति का ध्यान कर जगत् की सृष्टि और संहार कर सकता है ) । यही कारण है कि मूलाधार में स्थित यह महेश्वरी शक्ति ही मूल शक्ति है । प्रायः सभी सिद्ध, यही कारण है कि मूलोधारशक्ति—कुण्डलिनी को जगाने में तत्पर रहते हैं ॥ २० ॥ तरङ्गितस्वभावं जीवात्मानं वृथाभ्रमन्तमपि स्वप्रकाश मध्ये स्वस्वरूपतया सदा धारयितुं समर्था या सा कुण्डलिनी सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] - [ ११३