सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्याशक्तिर्गीयते स्थूलसूक्ष्मरूपेण महासिद्धानां प्रतीयत इति निश्चयः ॥ २१ ॥ मध्या शक्ति ( कुण्डलिनी ) का वर्णन किया जाता है। यह कुण्डलिनी चिद्रूप होने से जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप है। अविद्यावश संसार-बन्धन में विषयादि मृगतृष्णा में आसक्त जीवात्मा को यह मध्या शक्ति अपने चिद्रूप स्वप्रकाश में धारण करने में सदा समर्थ है। यह कुण्डलिनी स्थूल और सूक्ष्म— दो प्रकार की कही गयी है। इसकी महासिद्ध योगियोंको ही अच्छी तरह जानकारी रहती है, इसमें रञ्चमात्र भी सन्देह नहीं है ॥ २१ ॥ विशेष—महासिद्ध योगियों को यह कुण्डलिनी मूलाधार में सूक्ष्मरूपिणी और मणिपुर चक्र में स्थूल प्रतीत होती है। स्थूल-सूक्ष्म कुण्डलिनी स्थूलेति ।निखिलग्राह्याधारविग्राह्य स्वरूपापि पदार्थान्तरे भ्राम्यमाणा चिद्रूपा या वर्तते सा कुण्डलिनी साकारास्थूला- पुनस्त्वयमेव स्वप्रसारचातुर्यतया वर्तमाना योगिनां परमानन्द- तया कुण्डलिनी या निश्चयभूता वर्तते सा सूक्ष्मा निराकारा प्रबुद्धा महासिद्धानां मते प्रसिद्धा ॥ २२ ॥ यद्यपि मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी योगसिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त संसार में विषयासक्त बँधे जीवमात्र के लिये सूक्ष्म (अज्ञात) है तथापि यह शब्दात्मक स्थूल जगत् की सृष्टि करने के कारण साकार—स्थूल कही जाती है। वह रूपादि विषयों में भ्रमण—संचार करती रहती है, यही निज विस्तार- कौशल से नाभिस्थान—मणिपूर चक्र में अपने उपर्युक्त विषयसम्बन्धों को छोड़ कर अपने चैतन्यस्वरूप से योगियों को अपने आनन्ददायक व्यापक अखण्ड आत्मा का निश्चय कराती है। जागने पर यह सूक्ष्म रूप से, निराकार और सर्वत्र व्यापक रहती है। योगनिपुण महासिद्ध ही इस बात को अच्छी तरह जानते हैं ॥ २२ ॥ विशेष—जो योगसाधक कुण्डली को संचालित कर लेता है, वह सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है और मृत्यु को वश में कर अपने अखण्ड परमानन्द स्वरूप में लीन हो जाता है। ११४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति