सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसृष्टिकुण्डलिनी ख्याता द्विधा भागवती तु सा । एकधा स्थूलरूपा च लोकानां प्रत्यगात्मिका । अपरा सर्वगा सूक्ष्मा व्याप्ति-व्यापकवर्जिता । तस्या भेदं न जानाति मोहिता प्रत्ययेन तु ॥ २३ ॥ ( प्रत्येक प्राणी के मूलाधार में सूक्ष्म रूप से कुण्डलिनी विद्यमान है, वह प्रत्येक जीवात्मा में व्यापक है । ) यह भगवत्सम्बन्धवाली ( भागवती ) कुण्डलिनी दो प्रकार की है, यह स्थूल और सूक्ष्म है। यह स्थूल जगत् की सृष्टि करती है, इसलिये सृष्टि-कुण्डलिनी के रूप में प्रसिद्ध है । जब यह नाभिचक्र-- मणिपूर में प्रबुद्ध होकर उपाधिसम्बन्ध छोड़कर अखण्ड स्वरूप में ऊर्ध्वमुखी होकर प्रतिष्ठित होती है, तब वह सर्वव्यापक, सूक्ष्म और व्याप्तिव्यापक भाव से रहित होती है । विषयप्रपञ्च में सम्मोहित प्राणी उसके सत्स्वरूप को नहीं जान पाते हैं ॥ २३ ॥ तस्मात् सूक्ष्मापरा संवित्स्वरूपा मध्या शक्ति कुण्डलिनी योगिभिर्देहसिद्ध्यर्थं सद्गुरुमुखाज्ज्ञात्वा स्वस्वरूपदशायां प्रबोधनीया ॥ २४ ॥ इसलिये सूक्ष्म चिद्रूपिणी विषयरहित मध्य कुण्डलिनीशक्ति को देहसिद्धि ( मृत्यु को वश में करने ) के लिये गुरु के सदुपदेश से अपनी आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति के लिये जगाना चाहिये । (गुरु की कृपा से ही उनके मुख से तत्सम्बन्धी प्रबोधन-क्रिया का ज्ञान प्राप्त कर ही योगसाधक मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी को जगाकर सहस्रार की ओर ऊर्ध्वमुख करता है । ) यह संवित्स्वरूपा मध्य कुण्डलिनी नितान्त प्रबोधनीय है ॥ २४ ॥ अथ ऊर्ध्वशक्तिनिपातः कथ्यते सर्वेषां तत्त्वानामुपरिवर्त- मानत्वान्निर्नमं परमं पदमेवमूर्ध्वंप्रसिद्धं तस्याः स्वसंवेदन नानासाक्षात्कारसूचनशीलाया सोर्ध्वशक्तिरभिधीयते तस्या निपातनमिति स्वस्वरूपद्विधाभासनिरासः किन्तु स्वस्वरूपा- खण्डत्वेन भवति ॥ २५ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११५