सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( मध्य कुण्डलिनी शक्ति का सहस्रार में प्रवेश ही ऊर्ध्व-शक्तिनिपात कहा जाता है । ) ऊर्ध्वशक्ति-निपात का वर्णन किया जाता है । समस्त विषयप्रपञ्च— भौतिक पदार्थों के ऊपर वर्तमान रहने की स्थिति ही ऊर्ध्व है । नाम-रूप से रहित आदिनाथ परमेश्वरस्वरूप ही परमपद है । उस अनन्त अखण्ड परमात्मा की स्वरूपाभिव्यक्ति करनेवाली शक्ति ही ऊर्ध्व शक्ति ( परम जाग्रत् परमेश्वरी कुण्डलिनी ) कही जाती है । मूलाधार से मणिपूर चक्रादि का भेदन करती हुई महाकुण्डलिनी सहस्रार में शिव का ऐक्य प्राप्त कर 'यह, तुम, मैं' आदि के भेदभाव का अन्त कर देती है, किंतु ( साथ-ही-साथ ) परमात्मा और जीवात्मा के अखण्ड-अभिन्न व्यापक स्वरूप का ज्ञान करा देती है ॥ २५ ॥ शिवस्याभ्यन्तरे शक्ति शक्तेराभ्यन्तरः शिवः । अन्तरं नैव जानीयाच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥ २६ ॥ ( शक्ति और शक्तिमान्—स्वरूपतः दोनों एक-दूसरे में अभिन्न हैं । कूटस्थ असंग शिव सर्वत्र व्यापक हैं, शिव को धारण करनेवाली शक्ति भी व्यापक है । ) शिव में शक्ति है, शक्ति में शिव हैं, जिस तरह चन्द्रमा और चाँदनी में स्वरूपतः भेद—भिन्नता नहीं है, उसी तरह शिव और शक्ति में भिन्नता नहीं है । ' दोनों में कूटस्थता और असंगता की दृष्टि से व्यवहार में भेद परिलक्षित होता है और पारमार्थिक सत्ता में वे स्वरूपतः अखण्ड और अभेद हैं । ) शिव-शक्ति एक हैं ॥ २६ ॥ अत ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन योगिभिः परमं पदं प्राप्यत इति सिद्धम् ॥ २७ ॥ अतएव योगियों द्वारा ऊर्ध्व शक्ति—भगवती कुण्डलिनी महाशक्ति के निपात से सहस्रार में पूर्ण जाग्रत् कर प्रविष्ट कराने पर परम पद की—स्वरूप-स्थिति की प्राप्ति की जाती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । सत्त्वे सत्त्वे सकलरचना राजते संविदेका तत्त्वे तत्त्वे परममहिमा संविदेवावभाति । भावे भावे बहुलतरला लम्पटा संविदेषा भासे भासे भजनचतुरा बृंहिता संविदेव ॥२८॥ ११६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति