सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअखण्ड शुद्ध चैतन्य सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म सर्वत्र विद्यमान है। यह चेतन ही समस्त विश्वप्रपंच का आधार है। प्रकृति, माया आदि तत्वों पर महिमा सहित शक्ति सर्वत्र प्रकाशित हो रही है । समस्त मानसिक व्यापारों में इसी शक्ति की सत्ता अभिव्यक्त है। आशय यह है कि सभी पदार्थों की समस्त व्यवस्थाओं के अंगों और गुणों को एकत्र करने वाला तथा सभी प्रकार की सत्ताओं की व्यवस्थाओं में संवित् ही प्रकाशमान है । वही समस्त व्यावहारिक सत्ताओं के सीमित, परिवर्तनशील तथा अनेक वस्तुरूपों में स्वयं को प्रकट कर रहा है। सभी प्रकार के मानसिक अनुभवों में स्वयं को अनेक आत्मगत रूपों में प्रकट कर कौशल से वह संवित् ही अनेक सीमित विशेषतायें धारण कर लेता है ।। २८ ।। किमुक्तं भवति परापरविमर्शरूपिणी संविन्नानाशक्ति- रूपेण निखिलपिण्डाधारत्वेन वर्त्तते इति सिद्धान्तः ।। २६ ।। इस तरह परासंवित्स्वरूप शिवशक्ति के सामरस्य का स्पष्ट निर्णीत रूप यह है कि व्यष्टि-समष्टिभूत भौतिक समस्त पदार्थों का अनुभवरूप सच्चिदानन्दस्वरूप चेतन ब्रह्म ही निजा, परा सूक्ष्मा शक्ति-रूपों के द्वारा समस्त पिण्डोंका आधार (आश्रय) है ।। २६ ।। इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ चतुर्थोपदेशः ।। सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११७