भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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स्वरूप को प्राप्त हो जाता है, तब वह परमपद में स्वस्थ हो जाता है—यही परम- पद की स्वसंवेद्यता है । स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । ( गीता १० । १५ ) यह परमात्मा स्वप्रकाश से प्रकाशस्वरूप—अत्यन्त भासाभासक है । ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ( गीता १३ । १७ ) उपनिषद् में उल्लेख है कि स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा सूर्य-चन्द्र के प्रकाश से नहीं प्रकाशित होता, सूर्य-चन्द्र का तेज उस परमप्रकाश में विलय को प्राप्त हो जाता है । न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम् । ( कठोपनिषद् २ । ५ । १५ ) यह परमात्मपद सच्चिदानन्दस्वरूप होने से चक्षुरादिइन्द्रियातीत है । यत्र बुद्धिर्मनो नास्ति तत्त्वविन्नापराकला । ऊहापोहौ कर्तव्यौ, वाचा तत्र करोति किम् । वाग्मिनागुरुणा सम्यक् कथं तत्पदमीर्यते । तस्मादुक्तं शिवेनैव स्वसंवेद्यं परपदम् ॥ ३ ॥ उस परम पद के सम्बन्ध में बुद्धि किसी भी तरह का निश्चय नहीं कर सकती है, न मन, जो संकल्परूप है, उसमें प्रवेश पा सकता है, उस परमपद का न तो ( वाणी से ) मण्डन किया जा सकता है, न स्वरूप में स्थित कराने वाली कला भी उसका निर्वचन कर सकती है, न किसी धर्म-विशेष के आश्रय में उसका खण्डन किया जा सकता है । वाग्मी (वाचस्पति) गुरु के द्वारा भी उसका तत्वतः निरूपण नहीं हो सकता है । यही कारण है कि साक्षात् शिव ने उस परम पद को स्वसंवेद्य कहा है ॥ ३ ॥ विशेष—उस परम पद में चक्षुइन्द्रिय का प्रवेश नहीं है, उसमें वागिन्द्रिय की भी पहुँच नहीं है । मन ( अन्तःकरण ) का भी इसमें प्रवेश नहीं है । यह बतलाने से भी तो समझ में नहीं आ सकता है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११६