सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् । ( केनोपनिषद् १ । ३ ) साक्षात् शिव के कथन का सन्दर्भ महायोगी गोरखनाथ ने इस परम पद के सम्बन्ध में निरूपित किया है, जिसकी पुष्टि शिवसंहिता में की गयी है । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ॥ ( शिवसंहिता ५ । २१६ ) यह पद न तो वाणी से प्राप्त हो सकता है, न मन से ही । योगाभ्यासरूपी साधन से यह निर्मल ज्ञानस्वरूप स्वयं प्रकाशित होता है । अतएव नानाविध विचार्यचातुर्यचर्चाविस्मयाङ्गत्वाद् गुरुचरणकृपात्तत्त्वमात्रेण, निरुपाधिकत्वेन निर्णोतुं शक्यत्वात् स्वसंवेद्यमेव परमपदं प्रसिद्धमिति सिद्धान्तः ॥ ४ ॥ अतएव उस परम पद का वर्णन करने में अनेक प्रकार के सूक्ष्म विचारों में निपुण विद्वानों को भी विस्मित होना पड़ता है । यह परमपद तो निरुपाधिक है, प्रमाण आदि से इसकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, गुरु के चरण में शरणागत होने पर उनकी अहेतुकी कृपा से ही इसका ज्ञान—बोध प्राप्त हो सकता है, यह तो नितान्त निर्विकल्प समाधि में स्थित होने पर स्वानुभव में ही स्वयं प्रकाशस्वरूप अभिव्यक्त होता है, यह स्वसंवेद्य है । श्रुतिस्मृति में इस तरह का सिद्धान्त निर्णीत किया गया है ॥ ४ ॥ गुरु द्वारा सन्मार्गदर्शन गुरुरत्र सम्यक्सन्मार्गसन्दर्शनशीलो भवति सन्मार्गो योगमार्गस्तदितरः पाखण्डमार्गः । तदुक्तमादिनाथेन— योगमार्गेषु तन्त्रेषु दीक्षितास्तांश्च दूषकाः । तेहि पाखण्डिनः प्रोक्तास्तथा तैः सह वासिनः ॥ ५ ॥ १२० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति