भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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लोक में ऐहिक फलजनक ( सेवादि ) कर्म तथा यज्ञ, दानादि उत्कृष्ट पुण्यकर्म--दोनों ही सकाम बुद्धि से किये जाते हैं और जब भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म के सम्पादन द्वारा साधक कर्मफल की लिप्सा का त्याग कर देता है, तब यही विशेष रूप से योगमार्ग में स्वधर्म कहा जाता है ॥ २० ॥ भगवान् शिव ने श्रुति, स्मृति, तन्त्र और पुराण तथा आगमों में यही कहा है कि योगमार्ग से श्रेष्ठ मोक्षप्रद-- परमात्मवोधप्रदायक अन्य कोई मार्ग नहीं है ॥ २१ ॥ महायोगी गोरखनाथजी ने योग को वेदकल्पतरु का परम फल कहा है— द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् । शमनं भवतापस्य योगं भजत सत्तमाः ॥ ( गोरक्षशतक-६ ) वेद कल्पतरु हैं। जिस तरह कल्पतरु की शाखायें पक्षियों के आश्रयस्थान हैं, ठीक इसी तरह द्विजों ( पण्डितों, विद्वानों ) द्वारा वेद की शाखाओं, प्रति- शाखाओं का परिशीलन किया जाता है। वेदरूपी कल्पतरु का फल योग है। हे सत्पुरुषो ! इसका सेवन ( साधन ) करो। यह योग संसार के त्रय—आधिदैहिक आधिभौतिक और आधिदैविक ताप का शमन ( नाश ) कर देता है। इस अभ्यास अथवा साधन से सांसारिक दुःख अथवा भववन्धन समाप्त हो जाता है, स्वरूपबोध प्राप्त होता है। योगः संहननोपायो ज्ञानसङ्गतियुक्तिषु ॥ २२ ॥ लोके निकृष्टं सततं यं वा यं वा प्रकुर्वते । तं वा तं वा वर्जयन्ति लोका ज्ञानबलेन तु ॥ २३ ॥ मनुष्याणां च सर्वेषां प्राक् संस्कारवशादिह । शास्त्रयुक्तिसमाचारः क्रमेण भवति स्फुटम् ॥ २४ ॥ दो वस्तुओं को मिलाना ही योग है। लोक में अनित्य फल देने वाली वस्तुओं के योग का जो अर्थ किया जाता है, वह गौण है। यह योग तो ज्ञान- साधनपरक मोक्षप्रदायक है। ( यही योग का मुख्य अर्थ है । ) ज्ञानी लोक में व्यवहृत निकृष्ट अर्थ का परित्याग कर—अनित्य फलदायक गौण अर्थ के स्थान पर मुख्य अर्थ का ग्रहण करते हैं। सभी मनुष्यों की पूर्वजन्म के संस्कार सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२७