भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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और वासना के अनुरूप इस दिशा में प्रवृत्ति होती है । अतएव क्रमपूर्वक शास्त्र- युक्ति व्यवहार के प्रकट होने पर ही किन्ही-किन्हीं भाग्यशाली प्राणी की प्रवृत्ति योगसाधना में होती है ॥ २२–२४ ॥ एवं पिण्डे संसिद्धे ज्ञानप्राप्त्यर्थं तच्च परमं पद महा- सिद्धानां मतं परिज्ञाय च तस्मिन्नहं भावे जीवात्मा च सहजसंयमसोपायाद्वैतक्रमेणोपलक्ष्यते ॥ २५ ॥ इस तरह योगसाधना के द्वारा पिण्ड के सिद्ध होने पर अखण्ड ज्ञान की प्राप्ति के लिये महासिद्धों के मत में चिद्रूप शक्ति सहित अखण्ड शिवतत्त्व ही परम पद कहा जाता है । उस आत्मस्वरूप अखण्ड शिवतत्त्व में यह भाव स्थापित करे कि मैं ही शिव हूँ, मुझमें और शिव में सम्पूर्ण तादात्म्य है । परम शिव से अभिन्न जीवात्मा — जीव का वास्तविक आत्मस्वरूप ही सहज, संयम, सोपाय और अद्वैत क्रम से लक्षित होता है ॥ २५ ॥ सहजसंयमसोपायाद्वैतज्ञान तत्र सहजमिति विश्वातीतं परमेश्वरं विश्वरूपेणाव- भासमानमिति ज्ञात्वैकमेवास्तीति स्वस्वभावेन यज्ज्ञानं तत्सहजं प्रसिद्धम् ॥ २६ ॥ सहज ज्ञान का वर्णन किया जाता है । यद्यपि ( अलखनिरञ्जन ) परमेश्वर विश्वातींत निराकार और निर्गुण है तथापि वह मायाउपाधिसहित विश्वरूप में अवभासित, प्रतिभासित होता है । ऐसा समझ कर तत्वदृष्टि से परमेश्वर और मुझ ( जीवात्मा ) में पूर्ण अभेदता है । अपने आपको साधक परमात्मस्वरूप, असंग और व्यापक अनुभव करता है । इस तरह का स्वाभाविकं यथार्थ ( तत्व ) ज्ञान ही सहज ज्ञान है ॥ २६ ॥ संयम इति सावधानानां प्रस्फुरद्व्यापाराणां निजवर्तिनां संयमं कृत्वाऽऽत्मनि धीयत इति संयमः ॥ २७ ॥ १२८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति