भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 222 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171

सहज ज्ञान के उपरान्त संयम के क्रम का वर्णन किया जाता है । इन्द्रियाँ हमारे शरीर के कार्यों में अपने विषयों के ग्रहण में तत्पर रहती हैं । ( इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति स्वाभाविक है । ) निरन्तर विषय-ग्रहण-व्यापार में तत्पर इन्द्रियों तथा मन को विषयाभिमुख होने से निरुद्ध कर उन्हें आत्मा में—अखण्ड परमात्म स्वरूप में लगाना ही संयम कहा जाता है ॥ २७ ॥ सोपायमिति स्वयमेव प्रकाशमयं स्वेनैव स्वात्मन्येकीकृत्य सदा तत्त्वेन स्थातव्यम् ॥ २८ ॥ अब सोपाय का वर्णन किया जाता है । मैं स्वयमेव स्वप्रकाशस्वरूप ( द्वैताद्वैतविवर्जित अखण्ड परमात्मरूप ) हूँ—इस तरह परमात्मा में अपनी आत्मा को तत्त्वतः अभेद कर साधक को आत्मस्वरूप में स्थित रहना चाहिये । जिस ज्ञान से इस अखण्डस्वरूपता का बोध होता है, वही सोपाय ज्ञान है ॥ २८ ॥ अद्वैतमित्यकर्तृत्वेनैव योगी नित्यतृप्तो निर्विकल्पः सदा निरुत्थानत्वेन तिष्ठति ॥ २९ ॥ अब अद्वैत स्वरूपस्थितिका निरूपण किया जाता है । आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता है, वह असंग, शून्य, निर्विकल्प है । इस तरह आत्मा की परमात्मा में —अखण्ड निरञ्जन परमेश्वर में अभेदता का स्थापन कर—निरुत्थान भाव से परमात्मस्वरूप में स्थित योगी नित्यतृप्त होता है; उस परमात्मस्वरूप में सदा अच्युत रहता है ॥ २६ ॥ सहजं स्वात्मसंवित्तिः संयमः स्वस्वनिग्रहः सोपायं स्वस्वविश्रान्तिरद्वैतं परमं पदम् ॥ ३० ॥ जीवात्मा और परमात्मा में सम्पूर्ण अभेदता है—इस तरह का ज्ञान ही सहज कहलाता है । इन्द्रियों सहित मन को आत्मा में प्रवृत्त करना—निग्रहीत करना ही संयम है । अपने सत्स्वरूप में स्थिति-—विश्रान्ति ही सोपाय है और अद्वैत स्वरूप ही परम पद है ॥ ३० ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२६