सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसहज ज्ञान के उपरान्त संयम के क्रम का वर्णन किया जाता है । इन्द्रियाँ हमारे शरीर के कार्यों में अपने विषयों के ग्रहण में तत्पर रहती हैं । ( इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति स्वाभाविक है । ) निरन्तर विषय-ग्रहण-व्यापार में तत्पर इन्द्रियों तथा मन को विषयाभिमुख होने से निरुद्ध कर उन्हें आत्मा में—अखण्ड परमात्म स्वरूप में लगाना ही संयम कहा जाता है ॥ २७ ॥ सोपायमिति स्वयमेव प्रकाशमयं स्वेनैव स्वात्मन्येकीकृत्य सदा तत्त्वेन स्थातव्यम् ॥ २८ ॥ अब सोपाय का वर्णन किया जाता है । मैं स्वयमेव स्वप्रकाशस्वरूप ( द्वैताद्वैतविवर्जित अखण्ड परमात्मरूप ) हूँ—इस तरह परमात्मा में अपनी आत्मा को तत्त्वतः अभेद कर साधक को आत्मस्वरूप में स्थित रहना चाहिये । जिस ज्ञान से इस अखण्डस्वरूपता का बोध होता है, वही सोपाय ज्ञान है ॥ २८ ॥ अद्वैतमित्यकर्तृत्वेनैव योगी नित्यतृप्तो निर्विकल्पः सदा निरुत्थानत्वेन तिष्ठति ॥ २९ ॥ अब अद्वैत स्वरूपस्थितिका निरूपण किया जाता है । आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता है, वह असंग, शून्य, निर्विकल्प है । इस तरह आत्मा की परमात्मा में —अखण्ड निरञ्जन परमेश्वर में अभेदता का स्थापन कर—निरुत्थान भाव से परमात्मस्वरूप में स्थित योगी नित्यतृप्त होता है; उस परमात्मस्वरूप में सदा अच्युत रहता है ॥ २६ ॥ सहजं स्वात्मसंवित्तिः संयमः स्वस्वनिग्रहः सोपायं स्वस्वविश्रान्तिरद्वैतं परमं पदम् ॥ ३० ॥ जीवात्मा और परमात्मा में सम्पूर्ण अभेदता है—इस तरह का ज्ञान ही सहज कहलाता है । इन्द्रियों सहित मन को आत्मा में प्रवृत्त करना—निग्रहीत करना ही संयम है । अपने सत्स्वरूप में स्थिति-—विश्रान्ति ही सोपाय है और अद्वैत स्वरूप ही परम पद है ॥ ३० ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२६