भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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सद्गुरुका सेवन तज्ज्ञेयं सद्गुरोर्वक्त्रान्नान्यथा शास्त्रकोटिभिः । न तर्कशब्दविज्ञानान्नाचाराद्वेदपारगात् ।३१।। वेदान्तश्रवणान्नैव तत्वमस्यादिबोधनात् । न हंसोच्चारणाज्जीवब्रह्मणोरैक्यभावनातू ।३२।। न ध्यानान्नजपाल्लीनः सर्वज्ञः सिद्धिपारगः । स्वेच्छो योगी स्वयं कर्ता लीलया चाजरामरः ।।३३।। अवध्यो देवदैत्यानां क्रोडति भैरवो यथा । इत्येवं निश्चलो योऽसौ क्रमेणाप्नोति लीलया ।।३४।। असाध्याः सिद्धयः सर्वाः सद्गुरोः करुणां विना । अतस्तु गुरुरासेव्यः सत्यमीश्वरभाषितम् ।।३५।। इस परम पद का ज्ञान सद्गुरु (योगानुष्ठान में तत्पर मार्गदर्शक) के श्रीमुख से सदुपदेशामृत ग्रहण से ही प्राप्त होता है, चाहे करोड़ों शास्त्रों का अध्ययन किया जाय, चाहे साधक विज्ञान प्राप्त करे, चाहे अनेक तर्कों में निपुण हो, चाहे आचार में तत्पर हो, चाहे चारों वेदों में पारंगत हो, चाहे वेदान्तश्रवण में ज्ञाननिष्ठ हो, चाहे तत्वमसि आदि वाक्यों से आत्मतत्त्व में प्रबुद्ध हो, चाहे सोऽहं-सोऽहं-हंस मन्त्र (अजपा गायत्री) को सिद्ध कर ले, जीवात्मा-परमात्मा में अभेदता की अनुभूति करे, चाहे ध्यान लगाये, चाहे जप करे पर गुरु के उपदेश से ही योगी सिद्ध होता है, सर्वज्ञ होता है, सभी सिद्धियाँ उसके करतलगत हो जाती हैं, वह स्वयं कर्ता हो जाता है, अनायास अजर और अमर हो जाता है, वह सर्वत्र अभय हो जाता है, देवताओं और दैत्यों द्वारा वह अवध्य होता है। वह सर्वत्र भैरव- (साक्षात् भगवान् शिव-) रूप होकर विहार करता है । वह संशयरहित होता है और असाध्य सिद्धियों को अपने वश में कर लेता है । यह सब कुछ गुरु की कृपा के बिना असम्भव है, इसलिये (आदरपूर्वक प्रीतिपूर्वक) अच्छी तरह गुरु की शरण प्राप्त कर श्रद्धावान् होना चाहिये, ईश्वर (शिव) का यह कथन सत्य है, सत्य है ।। ३१-३५ ।। १३० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति