सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआशीर्वचन ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति की गरिमा ) परमक Philippe करुणामय भगवान् शिवगोरक्ष महायोगी गोरखनाथजी ने देववाणी में 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना कर अलखनिरंजन के साक्षात्कार का राजपथ प्रशस्त किया है। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नाथयोग पर प्रचुर प्रकाश डाला गया है। इस मौलिक योगवाङ्मय में शैवयोग के प्रतिपादन के साथ-ही-साथ निगमागम- पुराणस्मृतिसम्मत योगाचार, वैराग्य और मोक्ष के सैद्धान्तिक और प्रक्रियात्मक- साधनात्मक पक्षों का समीचीन समन्वय भी बोधगम्य शैली में निरूपित है, जिसका रसास्वादन वे ही कर सकते हैं, जो योगविज्ञान—हठयोगविद्या के द्वारा परम- साक्षात्कार की सिद्धि में अनुभवी और निष्णात हैं। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' को हमारे सिद्धामृतमार्ग अथवा नाथ-सम्प्रदाय में अपूर्व मान्यता प्राप्त है और योगि- सम्प्रदाय में ही नहीं, दार्शनिकों और विद्वानों में भी इस योगग्रंथ के प्रति यथेष्ट आदरभाव और श्रद्धा का दर्शन होता है। लगभग दो सौ साल पहले काशी के महान् योगदार्शनिक महामति बलभद्र ने 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' के रूप में 'सिद्ध- सिद्धान्तपद्धति' के सारांश का स्वरचित संस्कृत-श्लोकों में संग्रह किया था। महायोगी गोरखनाथजी की प्रशस्ति में बलभद्र ने कहा था— यत्कारुण्यवलोकनादपि भवेच्चित्तर्दाविश्रमः पारदः । तस्मिन् श्रीकरुणासुधारसनिधौ चेतोऽस्तुमग्नं गुरौ ॥ ( सिद्धसिद्धान्तसंग्रह ५ । ३६ ) जिनके कृपामय दृष्टिपात से चित्त शान्त और विषयों में अनासक्त हो जाता है, उन करुणासुधारसनिधि गुरु ( गोरखनाथ ) में मेरा मन निमग्न हो जाय। बलभद्र ने अपने ग्रंथ में 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' का ज्ञानामृत भर दिया है। गोरखनाथजी महान् योगाचार्य थे, इसलिये 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में उनके वचन उपदेश के रूप में उपलब्ध होते हैं। उन्होंने इस तरह इस योगग्रंथ के छः उपदेशों में महायोगज्ञानामृत का वर्णन किया था। गोरखनाथजी ने निरूपण किया [ १