भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 222 में से

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है कि किस तरह एक गत्यात्मक आध्यात्मिक परमसत्य से वैविध्यपूर्ण तथा अनेक भौतिक पदार्थों से युक्त विश्वप्रपंच उद्भूत है तथा इस सिद्धान्त का स्पष्टीकरण है कि किस प्रकार दिक्कालनिरपेक्ष भेदातीत, शाश्वत, परमात्मा अलखनिरंजन परम- शिव अपनी स्वरूपभूत शक्ति के द्वारा दिक्कालपरिसीमित वैविध्यपूर्ण ब्रह्माण्ड एवं असंख्य व्यष्टिपिण्डों के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसके आरम्भ में अजातवाद और तत्पश्चात् सत्कार्यवाद की रीति से आदिनाथ की सत्ता से पृथक् जगत्, अण्ड और पिण्ड की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। अण्ड-पिण्ड की उत्पत्ति प्रमाण सिद्ध नहीं है, क्योंकि आदिनाथ अलखनिरंजन की सत्ता से भिन्न जगत् की सत्ता नहीं है। नाथयोग में अजातवाद का ही सिद्धान्त यद्यपि मान्य है तथापि इस मान्यता की पुष्टि के लिये शरीर में ही सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड और जीवन्मुक्त अमरकाय योगियों ने परमात्मा की अखण्डता, अभिन्नता और निरंजनता (निर्मलता) का बोध प्राप्त किया। सत्कार्यवाद अथवा परिणामवाद पर यही अजातवाद की विजय है। जब तक योगी अथवा अध्यात्मविज्ञानी की परमात्म- स्वरूप में स्थिति और सम्पूर्ण निष्ठा नहीं हो जाती है, तब तक जन्म-मरण का दुःख नहीं छूट सकता और साधक की दृष्टि में विश्वप्रपंच की अहंकार के स्तर पर रागद्वेषादि द्वन्द्वात्मक मल या अविद्या के धरातल पर सत्ता बनी रहेगी। अण्डपिण्ड के रूप का ज्ञान हो जाने पर उसकी आधारशिला पारमार्थिक सत्ता का जीवात्मा- साधक को बोध हो जाना सरल हो जाता है। यह निर्विवाद है कि इस विश्व- प्रपंच की गत्यात्मकता के मूलकारण के रूप में कोई स्वयंसत्य, स्वयंप्रकाशितसत्ता है, जो हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि से परे अतीन्द्रिय, अतिमानसिक और अतिबौद्धिक स्तर पर अभिव्यक्त है। गोरखनाथजी ने इस शाश्वत चेतना को परासंवित् कहा है, यही परमसत्ता है। उन्होंने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के छः उपदेशों में पिण्डोत्पत्ति, पिण्डविचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार, पिण्डपदसमरसभाव और नित्यावधूतलक्षण आदि का निरूपण कर नित्यनिर्विकार परमसत्ता को ही जीवात्मा-योगसाधक के लिये प्रतिपाद्य स्वीकार कर उसके स्वरूपबोध अथवा अन्तर्लय की पद्धति सुनिश्चित की है। समष्टिब्रह्म, व्यष्टिब्रह्म, विशिष्टब्रह्म, सभी का मूल निरंजनता है, निरंशता, निस्पन्दता और अभिन्नता तथा निश्चयता है। शिवगोरक्ष की दृष्टि में अद्वैत आत्मा (परमात्मा) अपनी निजाशक्ति से युक्त होकर स्वरूपतः अभिन्न है। निजस्वरूप में निहित शक्ति की जागृति के स्तर पर परमात्मा शाश्वत, अनन्त परपिण्ड है। २ ]

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