सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयोगमहाज्ञान के उपदेष्टा सिद्धगुरुओं की सन्तान ( वंश ) -परम्परा का वर्णन किया जाता है । यह पाँच प्रकार का वर्णन किया जाता है । यह पांच प्रकार की है । आई नाम विमला शक्ति का है, यह आईनाथ या उदयनाथ से सम्बद्ध है, आई शिष्य को ही आईसन्तान-परम्परा से अभिहित किया जाना है । दूसरी परम्परा विलेश्वर गुरु की है । ( यद्यपि इस परम्परा में दीक्षित शिष्य दिगम्बर होते हैं—वस्त्र तक नहीं धारण करते तथापि अपने उपदेशामृत से श्रद्धालु अधिकारी व्यक्तियों को दीक्षित करते हैं । तीसरी परम्परा उन सिद्ध गुरुओं की है, जो विभूति धारण करते हैं, उनके द्वारा दीक्षित शिष्य विभूति- सन्तान कहे जाते हैं । चौथी परम्परा नाथयोग के सिद्ध गुरुओं की है, समस्त प्रपंचों से अतीत नाथतत्व की दीक्षा से दीक्षित शिष्य नाथसन्तान कहे जाते हैं । पाँचवीं परम्परा योगीश्वर सन्तान के रूप में विख्यात है । व्यापक, असंग अलख-निरञ्जन तत्वस्वरूप में लय को प्राप्त योगीगुरु शिष्यों की योग्यता के अनुरूप सदुपदेश प्रदान करते हैं । ऐसे शिष्य योगीश्वर-सन्तान के रूप में प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों परम्पराओं की पृथक्-पृथक् विशेषताएं हैं ॥ ४६ ॥ परमार्थतः सर्वं पाञ्चभौतिकं न जाताः पुरुषाः सम्बोधमात्रैकरूपः शिवस्तदितरत्सर्वमज्ञानमव्यक्तं भवति तत्र शिवस्तु ज्ञानम् ॥ ४७ ॥ परमार्थ के स्तर पर विचार करने से पता चलता हैं कि संसार की समस्त वस्तुएँ पाञ्चभौतिक हैं, पाँच तत्वों से उत्पन्न हैं । ( इस तरह गुरुप्रणाली भी पाँच रूपों में विभक्त है । ) जीवात्मा—पुरुष आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती ( क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका नाश भी होता है ), यह आत्मा सद्ज्ञानस्वरूप शिव है, शिव से इतर सब कुछ अज्ञान है, अज्ञान-अव्यक्त माया से बोधित यह जगत् प्रपञ्च मात्र है । एक मात्र शिव ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप व्यापक परमात्मा हैं ॥ ४७ ॥ एतेषामपि सन्तानानां केचित्स्वपराङ्मुखा वेशमात्रसम्पन्नाः क्रयविक्रयादिकं कुर्वन्ति सन्तानभेदं प्रत्यन्योन्यमधः कुर्वन्ति योगमार्गं द्वेषयन्ति ॥ ४८ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३३