सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन योगी-सन्तानों में अनेक आत्मविमुख होकर जगत् के व्यापार ( लेन- देन, संग्रह, त्याग आदि प्रपंच ) में तत्पर रहते हैं, केवल वेशमात्र धारण कर योगी कहलाते हैं। इस तरह परस्पर एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं और योगमार्ग से द्वेष करते हैं ॥ ४८ ॥ रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अतिमन्यवः । दाम्भिका मानिनः पापाधिककुर्वन्तीश्वरप्रियान् ॥ ४६ ॥ साधुसङ्गमसच्छास्त्रपरमानन्दलक्षितान् । स्वेच्छाचारविहारैकज्ञानविज्ञानसंयुतान् ॥ ५० ॥ यूयं शिष्टा वयं दुष्टा दुष्टा यूयं वयं तथा । एव वदन्ति चान्योन्यं प्रमोहेन निरन्तरम् ॥ ५१ ॥ इस तरह सन्मार्ग—योगमार्ग से भ्रष्ट योगी रजोगुणी होते हैं और भयानक से-भयानक संकल्पों की पूर्ति और कामनाओं की सिद्धि में लगे रहते हैं, वे बड़े क्रोधी, दाम्भिक और अभिमानी होते हैं, ऐसे पापात्मा परमात्मा के शरणागत, संत के संग और सच्छास्त्रों के अध्ययन में आनन्द लेने वाले, अखण्ड आत्मस्वरूप में रमण करने वाले आत्मज्ञानी और परमात्मतत्त्व के विज्ञानियों की निन्दा करते हैं कि आप अपने को शिष्ट और हमें दुष्ट समझते हैं, पर वास्तव में ( सज्जन के वेष में ) आप ही दुष्ट और हम लोग शिष्ट हैं; इस तरह अज्ञानी की तरह वे आपस में एक-दूसरे की निन्दा करते रहते हैं ॥ ४६-५१ ॥ पृथ्विजलं तथा वह्निर्वायुराकाशमेव च । एते सन्तानोदयास्तु सम्यगेव प्रकीर्तिताः ॥ ५२ ॥ शक्तिसम्वलित शिव की स्वप्रकृति से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- रूप में पाँच सन्तानों की उत्पत्ति का ही वर्णन उपलब्ध होता है ॥ ५२ ॥ काठिन्यं चार्द्रता तेजो धावनं स्थिरता खलु । गुणा एते च पञ्चैव सन्तानानां क्रमात्स्मृताः ॥ ५३ ॥ ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः । एताश्च देवताः प्रोक्ता सन्तानानां क्रमेणु तु ॥ ५४ ॥ १३४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति