सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वी का गुण कठोरता है, जल का गुण आर्द्रता है, अग्नि का गुण तेज है, वायु का गुण सञ्चरण है और आकाश का गुण अचलता स्थिरता है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ही इनके पाँच अधिष्ठातृ देवता हैं । ये पाँच गुरुसन्तान के रूप में यथाक्रम ( उपास्यरूप में ) वर्णित हैं । ( आदिनाथ शिव ही परम गुरु हैं, उन्हीं की सन्तान के रूप में इन पाँच गुरुवंश-परम्परा का वर्णन किया गया है । ) यही पाँचों गुरुसन्तानों का यथार्थ रूप में अवस्थाभेद से वर्णन है ॥ ५४ ॥ स्थूलसूक्ष्मकारणतुर्यं तुर्यातीतमिति पञ्चावस्थाः क्रमेण लक्ष्यन्ते । एतेषामपि सर्वेषां विज्ञाता यः स योगी सिद्ध पुरुषः स योगीश्वरेश्वर इति परमरहस्यं प्रकाशितम् ॥ ५५ ॥ स्थूल, सूक्ष्म, कारण, तुर्य और तुर्यातीत पाँच अवस्थायें हैं । ( इन्हें योग की सात भूमिकाएँ कही गयी हैं, नित्यानित्य वस्तु के विवेकपूर्वक तीव्र मुमुक्षारूप शुभेच्छा पहली भूमिका है । गुरुमन्त्र प्राप्त कर उपनिषद् तथा योगशास्त्र के अध्ययन में प्रवृत्तिमूलक विचारणा दूसरी अवस्था है । आसन, प्राणायाम तथा निदिध्यासनपूर्वक आत्मस्वरूप में प्रवृत्ति तनुमानसा नाम की तीसरी अवस्था है । समस्त जगत् में आत्मरूपता का ग्रहण सत्त्वापत्ति नाम की चौथी अवस्था है । विश्वप्रपञ्च में सम्पूर्ण अनासक्ति और अद्वैत स्वरूप में स्थिति असंसक्ति नाम की पाँचवीं अवस्था है । स्वरूपानन्द की प्राप्ति पदार्थाभाविनी नाम की छठी भूमिका है, कैवल्यावस्था की प्राप्ति तुर्यगा नाम की सातवीं भूमिका है । ) इन पाँचों अवस्थाओं का मर्मज्ञ योगी, सिद्धपुरुष, योगीश्वरेश्वर कहलाता है । इस तरह परम रहस्य का प्रकाशन किया गया ॥ ५५ ॥ अतएव सम्यग् निजविश्रान्तिकारकं महासिद्धयोगिनं सद्गुरुं सेवयित्वा सम्यक् सावधानेन परं पदं सम्पाद्य तस्मिन्निजपिण्डे च समरसभावं कृत्वात्यन्तनिरुत्थानेन सर्वानन्दत्वे निश्चलं स्थातव्यं ततः स्वयमेव महासिद्धो भवतीति सत्यम् ॥ ५६ ॥ योगसाधक को चाहिये कि वह मोक्षस्वरूप-प्रदान करने वाले महासिद्धयोगी सद्गुरु से सदुपदेश ग्रहण कर अत्यन्त सावधान होकर परमपद का ज्ञान प्राप्त करे सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३५