भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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( उपर्युक्त ) ये सभी सधान देह से साध्य हैं । इनमें आसक्त न होकर सिद्ध पुरुष आत्मस्वरूप परम पद में ही स्थित रहते हैं ॥ ६३ ॥ विशेष—स्वरूपावस्थिति के लिये इन दैहिक साधनों का अभ्यास सार्थक है अन्यथा ये सब-के-सब निरर्थक हो जाते हैं । गुरु की प्रसन्नता और परमपद तत् कथं गुरुदृक्पातात् प्रायो दृढानां सत्यवादिनां सा स्थितिर्जायते ॥ ६४ ॥ कथनाच्छक्तिपाताद्वा यद्वापादावलोकनात् प्रसादात्स्वगुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ॥ ६५ ॥ उस अखण्ड आत्मस्वरूप परम पद की प्राप्ति किस तरह होती है । सत्योन्मुख--सत्स्वरूप के इच्छुक दृढ़—योगाभ्यासमें विधिपूर्वक स्थित योगसाधकों में—प्रायः योग्यपात्रों में परम पद की स्थिति उत्पन्न होती है । गुरु के उपदेशामृत से, गुरुद्वारा सूक्ष्म धरातल पर शिष्य में शक्ति के संचार ( शक्तिपात ) से तथा शिष्य के प्रति गुरुकी सर्वांग में करुणामयी दृष्टि ( अवलोकन ) से उन्हीं के प्रसाद ( अनुग्रह ) से परमपद की प्राप्ति होती है ६४-६५ अतएव शिवेनोक्तम् । न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ॥ ६६ ॥ शिवका कथन है कि परम पद की प्राप्ति में गुरु के अनुग्रह से बढ़ कर दूसरा कोई उपाय नहीं है, नहीं है । यह साक्षात् शिवका आदेश है, शिवका-आदेश है, शिवका आदेश है, शिवका आदेश है ॥ ६६ ॥ वाङ्मात्राद्वाथदृक्पाताद् य करोतिच तत्क्षणात् । प्रस्फुटं शाम्भवं वेद्यं स्वसंवेद्यं परं पदम् ॥ ६७ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३७