भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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करुणाखण्डपातेनच्छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः । सम्यगानन्दजनकः सद्गुरुः सोऽभिधीयते ॥ ६८ ॥ जो केवल उपदेश मात्र से अथवा.कृपामयी दृष्टि से करुणा की अखण्ड वृष्टि करते हुए शिवस्वरूप ( शाम्भव ) स्वसंवेद्य परम पद को प्रकाशित कर शिष्य के आठ पाशों ( जरा, जन्म, मृत्यु, व्याधि, काम, क्रोध, मोह, अविद्या—अहंकार ) का नाश कर देता है और स्वरूपानन्द में प्रतिष्ठित कर देता है, वही सद्गुरु कहा जाता है ॥ ६७-६८ ॥ निमिषार्धार्धपाताद् वा यद्वापादावलोकनात् । स्वात्मानं स्थिरमाधत्ते तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६९ ॥ जो केवल निमिष के लेशमात्र से ही शक्तिपात के द्वारा अथवा करुणापूर्वक अवलोकन कर शिष्य को आत्मस्वरूप—परमपद में स्थिर (अधिष्ठित) कर देता है, उस गुरु को नमस्कार है ॥ ६६ ॥ नानाविकल्पविश्रान्ति - कथया कुरुते तु यः । सद्गुरुः स तु विज्ञेयो न तु मिथ्याविडम्बकः ॥ अतएव परमपदप्राप्त्यर्थं स सद्गुरुः सदा वन्दनीयः ॥ ७० ॥ जो अपने सद्ज्ञानामृत से ( साधक के अथवा शिष्यके हृदय में स्थित ) विश्वप्रपंचरूपविश्रान्ति—सांसारिक मोहजालका नाश कर देता है, वही सद्गुरु है । संसारके रमणीय विषयभोग में शिष्य को व्यामोहित कर असत्स्वरूप में स्थित करने वाला गुरु नहीं हो सकता है । अतएव परमपद को प्राप्त करानेवाले सद्गुरु की ही वन्दना करनी चाहिये ॥ ७० ॥ गुरुरिति गृणाति शं सम्यक् चैतन्यविश्रान्तिमुपदिशति विश्रान्त्या स्वयमेव परात्परं परमपदमेव प्रस्फुटं भवति तत्क्षणात् साक्षात्कारो भवति ॥ ७१ ॥ गुरु ( शिष्य के अज्ञान-अन्धकार का नाश कर उसे ) कल्याण प्रदान करता है । चैतन्यस्वरूप में प्रतिष्ठित होने का, परमपद में स्थित होने का १३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति