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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

करुणाखण्डपातेनच्छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः । सम्यगानन्दजनकः सद्गुरुः सोऽभिधीयते ॥ ६८ ॥ जो केवल उपदेश मात्र से अथवा.कृपामयी दृष्टि से करुणा की अखण्ड वृष्टि करते हुए शिवस्वरूप ( शाम्भव ) स्वसंवेद्य परम पद को प्रकाशित कर शिष्य के आठ पाशों ( जरा, जन्म, मृत्यु, व्याधि, काम, क्रोध, मोह, अविद्या—अहंकार ) का नाश कर देता है और स्वरूपानन्द में प्रतिष्ठित कर देता है, वही सद्गुरु कहा जाता है ॥ ६७-६८ ॥ निमिषार्धार्धपाताद् वा यद्वापादावलोकनात् । स्वात्मानं स्थिरमाधत्ते तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६९ ॥ जो केवल निमिष के लेशमात्र से ही शक्तिपात के द्वारा अथवा करुणापूर्वक अवलोकन कर शिष्य को आत्मस्वरूप—परमपद में स्थिर (अधिष्ठित) कर देता है, उस गुरु को नमस्कार है ॥ ६६ ॥ नानाविकल्पविश्रान्ति - कथया कुरुते तु यः । सद्गुरुः स तु विज्ञेयो न तु मिथ्याविडम्बकः ॥ अतएव परमपदप्राप्त्यर्थं स सद्गुरुः सदा वन्दनीयः ॥ ७० ॥ जो अपने सद्ज्ञानामृत से ( साधक के अथवा शिष्यके हृदय में स्थित ) विश्वप्रपंचरूपविश्रान्ति—सांसारिक मोहजालका नाश कर देता है, वही सद्गुरु है । संसारके रमणीय विषयभोग में शिष्य को व्यामोहित कर असत्स्वरूप में स्थित करने वाला गुरु नहीं हो सकता है । अतएव परमपद को प्राप्त करानेवाले सद्गुरु की ही वन्दना करनी चाहिये ॥ ७० ॥ गुरुरिति गृणाति शं सम्यक् चैतन्यविश्रान्तिमुपदिशति विश्रान्त्या स्वयमेव परात्परं परमपदमेव प्रस्फुटं भवति तत्क्षणात् साक्षात्कारो भवति ॥ ७१ ॥ गुरु ( शिष्य के अज्ञान-अन्धकार का नाश कर उसे ) कल्याण प्रदान करता है । चैतन्यस्वरूप में प्रतिष्ठित होने का, परमपद में स्थित होने का १३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सदुपदेश प्रदान करता है। इस तरह चैतन्यस्वरूप में विश्रान्ति के फलस्वरूप परमपद प्रस्फुटित प्रकाशित—होता है और शिष्य ( गुरु के अनुग्रहसे ) अखण्ड अनन्त, अलख-निरञ्जन परमशिव का साक्षात्कार करता है ॥ ७१ ॥ अतएव महासिद्धानां मते प्रोक्तं वाङ्मात्रेण सम्यगवलोकनेन वा तत्क्षणान्मुहुर्विश्रान्तियुक्तं करोतीति यः स सद्गुरुर्भवति । नोचेन्निजविश्रान्ति विना पिण्डपदयोः समरसकरणं न भवतोति सिद्धान्तस्तस्मान्निजविश्रान्तिकारकः सद्गुरुरभिधीयते नान्यः । पुनर्वागादिशास्त्रदृष्ट्यनुमानतर्क मुद्रया भ्रामको गुरुस्त्याज्यः ॥ ७२ ॥ योगज्ञान में सन्निष्ठ महासिद्धों के मत में कहा गया है कि केवल सदुपदेशमात्र से अथवा कृपामय कटाक्षपात से तत्काल ही सद्गुरु अपने शिष्य को स्वरूपावस्थिति—परमात्मनिष्ठा से संयुक्त कर देता है, अन्यथा बिना परमात्मनिष्ठा के पिण्डपद ( व्यष्टिशरीर में व्याप्त अखण्ड ज्ञानस्वरूप आत्मा और सकल ब्रह्माण्ड में व्याप्त परमात्मा ) से सामरस्य—अभेदतानुभूति सम्भव ही नहीं है, यह सिद्धान्त है । अतएव जो स्वरूपावस्थिति--परमात्मनिष्ठा ( निजविश्रान्ति ) से शिष्य को कृतार्थ कर देता है, वही सद्गुरु कहलाता है । वाग्जाल—शास्त्र की दृष्टि से तर्क, अनुमान आदि मुद्रा से भ्रमित कर शिष्य को सांसारिक विषय-प्रपञ्च में व्यामोहित करनेवाले गुरु का त्याग कर देना चाहिये, ऐसा गुरु निजस्वरूपस्थिति नहीं प्रदान कर सकता है ॥ ७२ ॥ ज्ञानहीनो गुरुस्त्याज्यो मिथ्यावादीविडम्बकः । स्वविश्रान्तिं न जानाति परेषां स करोति किम् ॥ ७३ ॥ जिसे योगविषयक ज्ञान नहीं है, जो शिष्यों को वाग्जाल में उलझा कर उन्हें दिग्भ्रमित करता है, जो आत्मप्रवञ्चक ( विडम्बनायुक्त ) है, वह गुरु नहीं है, वह त्याज्य है ( उससे दीक्षा नहीं ग्रहण करनी चाहिये ) । वह स्वयं जब अपनी स्वरूपस्थिति—परमात्म निष्ठा से अनभिज्ञ है तो दूसरों को किस तरह सन्मार्ग-दर्शन करा सकता है—आत्मज्ञान प्रदान कर सकता है ॥ ७३ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३६

शिलया किं परं पारं शिलासंघः प्रतार्यते । स्वयंतीर्णो भवेद्योऽसौ परान्निस्तारयत्यलम् ॥ ७४ ॥ जिस तरह (नदी के प्रवाह में) पड़ी शिला (धारामें प्रवाहित) अन्य शिलाओं को वहाकर उस पार उन्हें नहीं उतार सकती, उसी तरह जो स्वयं पार होने में , असमर्थ है, वह दूसरों को पार नहीं कर सकता है अथवा तारने में असमर्थ है । जो स्वयं तर जाने में समर्थ है, वही दूसरों को भी पार उतार सकता है ॥ ७४ ॥ विकल्पसागराद् घोराच्चिन्ताकल्लोलदुस्तरात् । प्रपञ्चवासन!दुष्टग्रहजालसमाकुलात् ॥ ७५ ॥ वासनालहरीवेगान्न स्वं तारयितुं क्षमः । स्वस्थेनैवोपदेशेन निरुत्थानेन तत्क्षणात् ॥ ७६ ॥ तारयत्येवदृक्पातात् कथनाद्वा विलोकनात् । तारिते स्वपदं धत्ते स्वस्वमध्ये स्थिरो भवेत् ॥ ७७ ॥ यह संसार एक दुस्तर सागर है, विषयवासनारूप संकल्प-विकल्पस्वरूप चञ्चलता से उद्वेलित है, यह बड़ा भीषण है, चिन्ता की लहरियाँ इसमें निरन्तर उठती रहती हैं, यह दुष्ट ग्राहों से पूर्ण जालरूप ममता-मोह आदि से आकुल है, विषय-वासनायें ही इसमें लहरियाँ हैं । इस संसार-सागर को जो तैर कर पार उतरने में समर्थ नहीं है, वह किस तरह दूसरों को पार उतार सकता है । जो अपने अखण्ड आत्मस्वरूपमें स्थित है, वही निरुत्थान ( जीवात्मा—परमात्मा में सामरस्य ) स्थापित कर शिष्य को सदुपदेश प्रदान कर कृपामयी दृष्टिपात कर अथवा ज्ञान प्रदान कर तारने में--भवसागर से पार उतारने में समर्थ है । वह स्वरूपस्थिति से परम पद में अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाता है, शिष्यको भवसागर से पार उतार देता है ॥ ७७ ॥ ततः स मुच्यते शिष्यो जन्मसंसारबन्धनात् । परानन्दमयोभूत्वा निष्कलः शिवतां व्रजेत् । ७८ ॥ कुलानां कोटिकोटीनां तारयत्येव तत्क्षणात् । अतस्तु सद्गुरुं साक्षात् त्रिकालमभिवन्दयेत् ॥ ७६ ॥ १४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सर्वाङ्गप्रणिपातेन स्तुवन्नित्यं गुरुं व्रजेत् । स जनः स्थैर्यमाप्नोति स्वस्वरूपमयो भवेत् ।। ८० ।। निरुत्थान के द्वारा परमपद में स्वस्थ गुरु के अनुग्रह से शिष्य जन्ममरण दुःखरूप ( यातनामय ) संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है, वह अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित होकर इन्द्रियादि के व्यामोह से मुक्त होकर शिवस्वरूप में प्रतिष्ठत हो जाता है । ऐसा गुरु करोड़ों कुल की सन्तानों ( योगियों ) का उद्धार कर देता है । इसलिये सदा-नित्यदण्डवत् प्रणामपूर्वक स्तवन करते हुए गुरु का ( विधिपूर्वक ) अभिवन्दन करना चाहिये । ऐसा शिष्य ( समर्थ सद्गुरु के शरणागत होकर ) परमात्मपद में अखण्ड स्वरूप में स्थित हो जाता है ।। ८० ।। किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतेन च । दुर्लभा चित्तविश्रान्तिर्विना गुरुकृपां पराम् ।। ८१ ।। चित्तविश्रान्तिलब्धानां योगिनां दृढ़चेतसाम् । स्वस्वरूपे निमग्नानां निरुत्थानं विशेषतः ।। ८२ ।। निमिषात् प्रस्फुटं भाति दुर्लभं परमं पदम् । यस्मिन् पिण्डो भवेल्लीनः सहसा नात्र संशयः ।। ८३ ।। इस सम्बन्ध में अधिक क्या कहा जाय । करोड़ों-करोड़ों शास्त्रका अध्ययन करने से भी विना गुरुकी कृपा प्राप्त किये चित्तवृत्तिनिरोधपूर्वक आत्मशान्ति ( विश्रान्ति ) दुर्लभ है । चित्तविश्रान्ति प्राप्त होने पर ही दृढ़ योगसाधन में तत्पर आत्मस्वरूप में निमग्न योगी को निरुत्थान—स्वबोध ( जागरण ) सुलभ होता है । निरुत्थान के परिणामस्वरूप तत्काल ही दुर्लभ परमपद प्रकाशित ( प्रत्यक्ष ) हो जाता है । इस परमपद में व्यष्टि-पिण्ड और परमात्म पिण्ड—ब्रह्माण्ड में सामरस्य स्थापित होता है । इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।। ८१-८३ ।। संवित्क्रियाविकरणोदयचिद्विलासो विश्रान्तिमेव भजतां स्वयमेव भाति । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४१

ग्रस्ते स्ववेगनिचये पदपिण्डमैक्यं सत्यं भवेत्समरसं गुरुवत्सलानाम् ॥ ८४ ॥ बुद्धिवृत्ति के विस्तार के उदयस्वरूप चिद्विलास-आत्मप्रकाश में ही गुरु के अनुग्रहप्राप्त शिष्यों में मानसव्यापार के निरुद्ध होने पर विश्रान्ति की स्थिति सम्भव होती है, उस विश्रान्ति में समष्टि-व्यष्टिरूप पदपिण्ड का ऐक्य-सामरस्य स्थापित होता है । जीवात्मारूप शिष्य परमात्मपद में गुरु की कृपा से अभेद-अभिन्न हो जाते हैं, उन्हें अखण्ड परमात्मस्वरूप-परमात्मपद अथवा परमपद की प्राप्ति हो जाती है ८४ ॥ इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ पञ्चमोपदेशः ॥ 卐 १४२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

छठा उपदेश [ अवधूत योगी ] अथ कोऽवधूतयोगिनामेत्यपेक्षायामाह । यः सर्वान् प्रकृतिविकारानवधुनोतीत्यवधूत योगी । योगोऽस्यास्तीति धूञ्कम्पने धूजिति धातुः कम्पनार्थे वर्तते । कम्पनं चालनं देहदैहिकप्रपञ्चादिषु विषयेषु सङ्गतं मनः परिगृह्य तेभ्यः प्रत्याहृत्य स्वधाममहिम्नि परलीनचेताः प्रपञ्चशून्य आदिमध्यान्तनिधनभेदवर्जितः ॥ १ ॥ ( सद्गुरु से सदुपदेशामृत प्राप्त कर व्यष्टि-पिण्ड और ब्रह्माण्ड में जीवात्मा-परमात्मा का सामरस्य स्थापित कर सिद्धि प्राप्त करने पर नित्य अवधूत स्वरूप की प्राप्ति होती है । ) अवधूत योगी का स्वरूप क्या है, इस जिज्ञासा के समाधान के लिये अवधूत के लक्षण का वर्णन किया जाता है । जो समस्त प्रकृति-विकार-देह, इन्द्रिय, मन और अनात्मसम्बन्धरूप विषयप्रपञ्चादि मलों का अवधूनन-त्याग कर निर्मल स्वरूप में संस्थित हो जाता है, वही अवधूत योगी है । धूञ् धातु 'कम्पन, चालन' अर्थ में प्रयुक्त होता है, जिसका आशय यह है कि दैहिक प्रपञ्चादिविषयों में आसक्त मन को निगृहीत कर उन विषयों से प्रत्याहारित कर-हटाकर प्रपञ्चरहित होकर तथा जन्म-मरण आदि दुःखों से-द्वन्द्वात्मक परिस्थितियों से छुटकारा पाकर अपने अखण्ड ज्ञानस्वरूप परम शिव में ( सामरस्य के द्वारा ) तल्लीनचित्त योगी ही नित्य अवधूत है ॥ १ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४३

यकारो वायुबीजं स्याद्रकारो वह्निबीजकम् । तयोरभेद्योंकारश्चिदाकारः प्रकीर्तितः ॥ २ ॥ 'य' वायु का बीज है, 'र' अग्नि का बीज है, दोनों का ऐक्य—सामरस्य ही चिद्रूप ओंकार 'ॐ कहा जाता है ॥ २ ॥ विशेष—तन्त्र में शिव को बिन्दु और शक्ति को बीज कहा गया है । इस तरह महायोगी गोरखनाथ ने अपने योगग्रन्थों में जहाँ पाँच भूत-तत्त्व, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की धारणा का निर्देश किया है, वहीं उनके बीज का भी क्रमश 'ल' 'व', 'र' 'य' और ह' का वर्णन किया है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति के उपर्युक्त दूसरे श्लोक में 'य' और 'र' बीज के कथनका आशय है सभी तत्त्वों के 'बीज' का ग्रहण । पाँच भूतों का लय अपने 'बीज' में स्थापित होता है और चिद्रूप बीज का लय ऊंकार-प्रणव में होता है । ओंकार-ॐकार ही समस्त बीज मन्त्र और शब्दों का उपादान कारण है । इस तरह चिद्रूपा शक्ति से ऊंकार प्रणव का तादात्म्य ही शक्ति और शिव की अभेदता—एकता अथवा समरसता है । इस सामरस्यसे योगी दिव्य शरीर वाला हो जाता है । भगवान् शिव का प्रकारान्तर से कथन है । अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा । योगिनां साधनावस्था भवेद् दिव्यं वपुस्तदा ॥ ( शिवसंहिता ४ । ८७ ) तदेतद् व्यक्तमुच्यते— क्लेशपागत रङ्गाणां कृन्तनेन विमुण्डनम् । सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ३ ॥ जो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, पंचक्लेशरूपी जाल के वेग का उच्छेद कर देता है और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में प्रपञ्च से मुक्त हो जाता है, वही (आत्मस्वरूप में स्थित ) योगी अवधूत कहा जाता है ॥ ३ ॥ निजस्मरविभूतिर्यो योगी स्वाङ्गे विभूषितः । आधारे यस्य वा रूढिः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ४ ॥ १४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

अविद्यादि पंच क्लेश के स्मरण से परे होकर जो योगी अपने स्वरूप को इन पाँचों क्लेश के नाशरूप भस्म से समलंकृत करता है और आचार्य ( गुरु ) द्वारा निर्दिष्ट योगमार्ग में नित्य आरूढ—दृढ़ रहता है, वही अवधूत कहा जाता है ।। ४ ।। लोकमध्ये स्थिरासीनः समस्तकलनोज्झितः । कौपीनं खर्परोऽदैन्यं सोऽवधूतोऽभिधीयते । ५ । ( अपने स्वरूप का स्मरण कराने वाले विभूतिरूप अलंकार से शोभित ) विषयप्रपञ्चरूप संसार ( लोक ) में अखण्ड आत्मस्वरूप में दृढ़भाव से स्थित रहनेवाला, समस्त संकल्पविकल्परूप भेद-भाव से विमुक्त, कटि में ( वस्त्ररूप ) केवल मात्र कौपीन, हाथ में ( जल पीने के लिये तथा भिक्षा-ग्रहण के उद्देश्य से ) खर्पर मात्र धारण कर ( लोक में ) दैन्यरहित—सर्वसमर्थ रूप में विचरण करने वाला अभय योगी ही अवधूत कहलाता है ।। ५ ।। अवधूत के वेष और चिह्न शं सुखं खं परं ब्रह्म शङ्खं सङ्घट्टनाद् भवेत् । सिद्धान्तो धारितो येन सोऽवधूतोऽभिधीयते । ६ । 'शं' शब्द सुख ( लोककल्याण ) का वाचक है और 'ख' शब्द ( अपने अखण्ड ज्ञानस्वरूप-परमात्मा ) परब्रह्म का वाचक है ।। दोनों के मेल—ऐक्य अथवा योग से 'शंख' शब्द सिद्ध होता है । अपने आत्मस्वरूप में स्थित होकर अपने ज्ञानरूप उपदेशामृत और योगसाधन से जगत् के प्राणियों को सन्मार्ग पर लगा कर उनका कल्याण सम्पादन करने वाला ही अवधूत है । वह शंख धारण करता है —यही सिद्धान्त है । ( शंख को बाह्य चिह्न भी परिलक्षित किया जा सकता है ।) अतएव शंख धारण करने वाला अवधूत कहा जाता है ।। ६ ।। पादुका पदसंवित्तिर्मृगत्वक् स्यादनाहता । शेली यस्य परासंवित् सोऽवधूतोऽभिधीयते । ७ । मेखला निवृत्तिर्नित्यं स्वस्वरूपं कटासनम् । निवृत्तिः षड्विकारेभ्यः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ८ । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४५

चित्प्रकाशपरानन्दौ यस्य वै कुण्डलद्वयम् । जपमालाक्षविश्रान्तिः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ६ । यस्य धैर्यमयोदण्डः पराकाशञ्च खर्परम् । योगपट्टो निजा शक्तिः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १० । पादुका परमात्म-ज्ञान का स्वरूप है, जिसने पैर में पादुका को धारण किया है, (आन्तरिक लक्षण के रूप में ) जो परमात्म-ज्ञान के आश्रय में स्थित है, जिसने मृगचर्म धारण किया है अथवा (मृगचर्मरूप) अनाहत नाद से जो विशोभित है, पराशक्तिरूप (चिद्रूप) ज्ञान से जो युक्त है अथवा परासंवित् रूप शेली जिसने गले में धारण की है, वह अवधूत कहा जाता है। जिसने कटि में मेखला पहनी है अथवा जो मेखलारूप (प्रापंचिक विषयों में) निवृत्ति को धारण करने वाला है, जो स्थिर आसन पर स्थित है अथवा स्थितआसनरूपी आत्म- स्वरूप में ही जो संस्थित है, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—छः विकारों से निवृत्त—परे है, वही अवधूत है। जिसने कानों में दो कुण्डल धारण किये हैं अथवा चित्प्रकाश और परमानन्द से जो सम्पन्न है, जपमाला धारण कर (मन्त्रजापपूर्वक) जो आत्मसत्ता का स्मरण करता है अथवा जिसकी दृष्टि में विषय-प्रपंचों से उपरति ही चित्त-विश्रान्ति है, वही अवधूत कहा जाता है। जो दण्ड धारण करता है अथवा धैर्य धारण करना जिसके लिये (योगसाधना में) दण्डरूप है, जो हाथ में खर्पर (खप्पर) धारण करता है या पराकाश ही जिसके लिये खर्पर है और जो योगपट्टधारण करता है अथवा निजाशक्ति ही जिसके लिये योगपट्ट है, वही अवधूत कहा जाता है ॥ ७–१० ॥ भेदाभेदौ स्वयं भिक्षां कृत्वा स्वास्वादने रतः । जारणातन्मयो भावः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ११ । अचिन्त्ये निजदिग्देशे स्वान्तरं वस्तु गच्छति । एकदेशान्तरीयो यः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १२ । स्वपिण्डममरीकर्तुमनन्ताममरीं च यः । स्वयमेवपिबेदेतां सोऽवधूतोऽभिधीयते । १३ । अचिन्त्यावज्ज्रवद्गाढ़ा वासनामलसंकुला । १४६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सा वज्री भक्षिता येन सोऽवधूतोऽभिधीयते । १४ । आवर्तयति यः सम्यक् स्वस्वमध्ये स्वयं सदा । समत्वेन जगद् वेत्ति सोऽवधूतोऽभिधीयते । १५ । जो भेद, अभेद, द्वैत और अद्वैत से अतीत होकर द्वैताद्वैतविलक्षण स्वसंवेद्य, अखण्ड ज्ञानस्वरूप आत्मरस के आस्वादन में तत्पर है और जागरण— रागद्वेष भाव में पूर्ण वैराग्यभाव से तन्मय है अथवा सच्चिदानन्दस्वरूप में स्वस्थ है, वह अवधूत कहा जाता है । जो देश-काल से अतीत सर्वव्यापक अपने ही में असीम परमात्मा को प्राप्त कर लेता है और ( दूसरों की दृष्टि में ) एकान्त वास में रहते हुए भी जो अपने स्वसंवेद्य स्वरूप में सब जगह विद्यमान है, वही अवधूत कहा जाता है । जिसने पार्थिव—भौतिक शरीर को अमर—मृत्युरहित करने के लिये ( खेचरी मुद्रा की सिद्धि के द्वारा ) सहस्रार से द्रवित चन्द्रामृत का ( विपरीत करणी से ) स्वयं पान कर लिया है अथवा जो पान कर लेता है, वह अवधूत कहा जाता है । जिसने मल से दूषित वज्रनाड़ी को (प्राणायाम आदि की सिद्धि से) मल रहित कर लिया है अथवा वज्रोली के अभ्यास द्वारा जिसने शरीर में वीर्य को ऊर्ध्वमुख कर जीर्ण कर दिया है, पचा लिया है, वह अवधूत कहलाता है । जो अपने आत्मस्वरूप में परमात्मा की अभेदानुभूति करता है अथवा आत्मा-परमात्मा में सामरस्य की सिद्धि कर आत्मपद में प्रतिष्ठित हो जाता है, वही सर्वत्र व्यापक योगी अवधूत कहा जाता है ॥ ११–१५ ॥ अवधूत की अवस्था ( स्थिति ) स्वात्मानमवगच्छेद्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते । अनुत्थानमयः सम्यक् सोऽवधूतोऽभिधीयते । १६ । अनुत्थाधारसम्पन्नः परविश्रान्तिपारगः । धृतिचिन्मयतत्वज्ञः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १७ । अव्यक्तं व्यक्तमाधत्ते व्यक्तं सर्वं ग्रसत्यलम् । स सत्यं स्वान्तरे सन्न सोऽवधूतोऽभिधीयते । १८ । अवभासात्मको भासः प्रकाशे सुखसंस्थितः । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४७

लीलयारमते लोके सोऽवधूतोऽभिधीयते । क्वचिद् भोगी क्वचित्त्यागी क्वचिन्नग्नोदिगम्बरः । क्वचिद्राजा क्वचाचारी सोऽवधूतोऽभिधीयते । १९ । जो अपने अखण्ड आत्मस्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभवी—साक्षात्कार करने वाला है और अपने उस स्वरूप में स्थित है और अनुत्थान ( आत्मा-परमात्मा के ऐक्य ) भाव में तल्लीन है, वही अवधूत कहलाता है । जो परमात्मा-आत्मा के एक स्वरूपमय तादात्म्य में स्वाश्रित—आत्माभिव्यक्त है और सत्स्वरूप में स्थिति ( विश्रान्ति ) का स्वामी है और धैर्यपूर्वक सच्चिदानन्द—परमात्मतत्व में स्थित है—व्यक्त है तथा स्व में भी लीन ( अव्यक्त ) हो जाता है अथवा व्यक्त को अव्यक्त और अव्यक्त परमात्मा को व्यक्त करता है, वह ( अपने भीतर सत्स्वरूप में विद्यमान ) अवधूत कहा जाता है। जो समस्त चराचररूप जगन्मात्र का प्रकाशक है और अपनी ही अन्तर्ज्योति—अखण्डपरमात्म प्रकाश में आनन्द का अनुभव करता है और इस लोक में—लोकव्यवहार में स्वस्थ है, वह अवधूत कहलाता है। जो भोगी, योगी, नग्न दिगम्बर, योगिराज तथा गुरु—सभी रूपों में अखण्ड स्वरूप में प्रतिष्ठित रह कर जीवन धारण करता है, वही अवधूत कहलाता है ॥ १६-१९ ॥ एवं विध नानासंकेतसूचको नित्यप्रकाशे वस्तुनि निजस्व- रूपी सर्वेषां सिद्धान्तदर्शनानां स्वस्वरूपदर्शने सम्यक् सद्- बोधकोऽवधूत योगीत्यभिधीयते स सद्गुरुर्भवति । यतः सर्व- दर्शनानां स्वस्वरूपदर्शने समन्वयं करोति सोऽवधूतयोगो स्यात् । २० । इस तरह नित्य प्रकाश—शुद्ध, बुद्ध, व्यापक आत्मस्वरूप में ही अनेक ( विभिन्न ) सिद्धान्त-दर्शनों का स्वरूप-दर्शन में ही सद्बोध सिद्ध ( प्रकाशित ) करने वाला अवधूत कहा जाता है, वह योगी अवधूत सद्गुरु होता है; क्योंकि वह सभी दर्शनों ( अभेदात्मदर्शी मतों ) का स्वरूप में ही समन्वय ( आत्मानुभव ) करता है। वास्तव में सर्वत्र आत्मदर्शन करने वाला योगी ही अवधूत है ॥ २० ॥ १४८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

अवधूत की सर्वस्वरूपता अत्याश्रमी च योगी च ज्ञानी सिद्धश्च सुव्रतः । ईश्वरश्च तथा स्वामी धन्यः श्रीसाधुरेव च । २१ । जितेन्द्रियश्च भगवान् स सुधी कोविदो बुधः । चार्वाकश्चार्हंतश्चेति तथा बौद्धः प्रकाशवित् । २२ । तार्किकश्चेति सांख्यश्च तथा मीमांसको विदुः । देवतेत्यादि विद्वद्भिः कीर्तितः शास्त्रकोटिभिः । २३ । आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति पुनः स्वयं । अस्तितत्त्वं परं साक्षाच्छिवरुद्रादिसंज्ञितम् । २४ । अवधूत अपने स्वसंवेद्य, द्वैताद्वैतविलक्षण, अखण्ड आत्मस्वरूप में आत्मस्थित रहता है, इसलिये वह आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) की अवस्थाओं से परे होने से अत्याश्रमी कहा जाता है, वह (स्वरूप-) ज्ञानी- तत्वविद्, सिद्ध और योगसाधना-व्रत में—जगन्मात्र को परमात्मस्वरूप समझने में दृढ़ होता है। वह सृष्टि, पालन (स्थिति) और संहार में (शक्तियुक्त होने से साक्षात्) ईश्वर होता है, वह स्वामी (आत्मनिग्रही) होता है, वह सर्वदा कृतार्थ और साधु होता है। वह जितेन्द्रिय, आत्मज्ञ, सद्बोधयुक्त, तत्वचिन्तक और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र साकार-सगुण भगवान् (सर्वसमर्थ) होता है। वह समस्त नास्तिक-आस्तिक दर्शन में आत्मबुद्धि रखने के कारण सब में अखण्ड आत्मस्वरूप में समाहित रहने वाला, चार्वाक (सांसारिक विषय-भोग-प्रवृत देहात्म- वादी), आत्मस्वरूप को प्राप्त अर्हंत (जैन), स्वात्मप्रकाश में प्रबुद्ध होकर भी (बुद्धिवृत्तरूपक्षणिक आत्मविज्ञानवादीसुगत) बौद्ध, न्यायवैशेषिक दर्शनाव- लम्बी परिणामवादी, सांख्यवादी (तत्त्वनिष्ठ) ज्ञानी, कर्मकाण्ड को ही परमफल प्राप्ति कराने वाले साधन में निष्ठ पूर्वमीमांसक, संसार का कारण देवता, स्वभाव, काल, कर्म समझने वाले अनेकानेक शास्त्रों और विद्वानों के विचार का समर्थक, वह योगी अवधूत आत्मदर्शन में स्वस्थ होने से सर्वस्वरूप होता है। आत्मा, परमात्मा, जीवात्मा, स्वस्वरूप, शिवरुद्र-नामयुक्त साक्षात् सर्वात्मा ही अवधूत योगी होता है ॥ २१-२४ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४६

विशेष—सांख्यदर्शन ने आत्म की असंगता का प्रतिपादन किया है—असंगता का तात्पर्य है सर्वात्मस्वरूपावस्थान, जो सिद्धसिद्धान्त है। महर्षि कपिल का वचन है : असङ्गोऽयं पुरुष इति ॥ ( सांख्यदर्शन १ । १५ ) न्यायदर्शन में दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति अथवा अभाव ही स्वरूपस्थिति- अपवर्ग अथवा निःश्रेयस या ब्रह्मप्राप्ति है, जड़ तथा चेतन का विवेक (तत्त्वज्ञान) ही दुःखनिवृत्ति का साधन है, जिससे स्वरूप-स्थिति सिद्ध होती है। दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदन्तराभा- वादपवर्गः ।' ( न्यायदर्शन १ । १ । २ ) जयन्त भट्ट ने भी न्यायवादी महर्षि गौतम के मत की पुष्टि की है। स्वरूपेण व्यवस्थानमतो मोक्ष : ( न्यायमञ्जरी ) वैशेषिक-दर्शन में आत्मा के शाश्वत अखण्ड स्वरूप का ही प्रतिपादन किया गया है। महर्षि कणाद का कथन है। सदकारणवन्नित्यम् ( वैशेषिकदर्शन ४ । १ । १ ) पूर्वमीमांसक महर्षि जैमिनि ने एक परमात्मा को ही सर्वोपरि कहा है। 'एकत्वेऽपि परम् ।' ( पूर्वमीमांसासूत्र २ । ४ । १३ ) इसी तरह वेदान्तदर्शन में महर्षि व्यास ने आत्मा के स्वरूप-प्रतिपादन में कहा है। तस्य च नित्यत्वात् । ( वेदान्तसूत्र २ । ४ । १६ ) इस तरह अत्याश्रमी योगी अवधूत सर्वथा आत्मस्वरूप में स्वस्थ होता है। १५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

शरीरपद्मकुहरे यत्सर्वेषामवस्थितम् । तदवश्यं महापाशाच्छेदितव्यं मुमुक्षुभिः । २५ । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सोऽक्षरः परमस्वराट् । स एवेन्द्रः स च प्राणः कालाग्निः स च चन्द्रमाः । २६ । स एव सूर्यः स शिवः स एव परमः शिवः । स एव योगगम्यश्च सांख्यशास्त्रपरायणैः । २७ । स एव कर्म इत्युक्तः कर्ममीमांसकैरपि । सर्वत्र सत्परानन्द इत्युक्तो वैदिकैरपि । २८ । व्यवहारैरयं भेदस्तस्मादेकस्य नान्यथा । २६ । मुद मोदे तु रा देने जीवात्मपरमात्मनोः । उभयोरेकसंविन्त्तिमुं द्रेति परिकीर्तिता । ३० । मोदन्ते देवसङ्घाश्च द्रवन्तेऽसुरराशयः । मुद्रे'ति कथिता साक्षात् सदा भद्रार्थदायिनी । ३१ । अस्मिन्मार्गेऽदीक्षिता ये सदा संसाररागिणः । तेहि पाखण्डिनः प्रोक्ताः संसारपरिपेल्वाः । ३२ । अवधूततनुर्योगी निराकारपदे स्थितः । सर्वेषां दर्शनानाञ्च स्वस्वरूपं प्रकाशते । ३३ । सभी प्राणियों के शरीर में स्थित ( पद्मकुहर ) हृदय में आत्मस्वरूप स्थित है । यह अविद्यारूप महान् मोह-शोक आदि पाशों से आबद्ध है, ( मोक्ष पद की प्राप्ति करने वाले ) मुमुक्षुओं को चाहिये कि इस पाश का उच्छेद कर अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में स्वस्थ हो जायें । यह आत्मस्वरूप ( आत्मतत्व ) ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, अक्षर, स्वराट्, इन्द्र, प्राण, काल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, शिव के नामरूप में अभिव्यक्त परम शिव है । योगसाधना के फलस्वरूप इसी स्वसंवेद्य तत्व का परम अनुभव होता है । सांख्यशास्त्र के तत्वज्ञ इसी को परम पुरुष जानते हैं, पूर्वमीमांसा मत से यज्ञादि कर्म के फलस्वरूप इसी महत्तत्व का दिग्दर्शन परिलक्षित है, श्रुति की ऋचायें और सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५१

वेदान्त सूत्र इसी को परमानन्दस्वरूप परमात्मा कह कर प्रतिपादित करते हैं। इस तरह विभिन्न दर्शनों में व्यवहृत नाम-रूपों में अभिव्यक्त सत्स्वरूप है। यह आनन्द प्रदान करता है और जीवात्मा-परमात्मा के ऐक्य-स्वरूप अथवा सामरस्य का यह आत्मतत्व परम सत्य है, दोनों की अखण्ड ज्ञानस्वरूपावस्थिति—संवित्ति मुद्रा के रूप में परिकीर्तित—प्रसिद्ध है। (मुद्रा में मुद् का अर्थ है आनन्द और रा का अर्थ है प्रदान करना।) मुद्रा (वाह्य चिह्न के रूप में) योगी अपने कानों में धारण कर देवताओं को प्रसन्न कर कल्याणभाजन होते हैं और असुरों को भयभीत—कम्पित (द्रवित) करते हैं अथवा देवता आनन्दित होते हैं और असुर भयभीत होकर भाग जाते हैं। इस योगमार्ग—सिद्धामृत मार्ग में जो सद्गुरुद्वारा दीक्षित—उपदिष्ट नहीं हैं और संसार के विषय-भोगादि प्रपंच में रागासक्त हैं तथा संसार को ही रमणीय समझ कर आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में विस्मृत होते हैं, वे ही पाखण्डी—मिथ्यावादी कहलाते हैं। अवधूत योगी तो अपने योगज्ञान के प्रकाश से समस्त आत्मसम्बन्धी तत्वज्ञान में स्वरूप का बोध प्राप्त कर अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में संस्थित होकर आत्मतत्व को प्रकाशित करता है॥ २५–३३॥ सर्वतो भरिताकारं निजबोधेन बृंहितम्। चरते ब्रह्मविद्यस्तु ब्रह्मचारी स कथ्यते। ३४। गृहिणी पूर्णता नित्या गेहं व्योमं सदा बलम्। यस्तया नित्रसत्यत्र गृहस्थः सोऽभिधीयते। ३५। तदान्तः प्रस्थितो योऽसौ स्वप्रकाशमये वने। वानप्रस्थः स विज्ञेयो न वने मृगवच्चरन्। ३६। परमात्माऽथ जीवात्मा आत्मन्येव स्फुरत्यलम्। तस्मिन्न्यस्त सदा येन संन्यासीसोऽभिधीयते। ३७। अत्याश्रमी—आश्रम धर्मपालन की मर्यादा से परे अवधूत योगी सर्वभाव से ब्रह्मस्वरूप में अखण्ड ज्ञानयुक्त आत्मबोध से पूर्ण होकर ब्रह्मज्ञानी—साक्षात् ब्रह्मरूप होने से ब्रह्मचारी कहा जाता है। वह यद्यपि अनिकेत, पवित्रात्मा और योगसाधना में ही नित्य तृप्त होता है तथापि वह गृहस्थ कहा जाता है, क्योंकि पूर्णता—अखण्ड ब्रह्मरूपता ही उसकी जीवन-संगिनी अथवा सहधर्मिणी है, १५२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सर्वव्यापक शून्य (व्योम) ही. उसका निवास है. अथवा वह ब्रह्म—अलख निरञ्जन परमेश्वर में स्वशक्ति से स्वस्थ अथवा अधिष्ठित होता है। स्वप्रकाशमय—अखण्ड अन्तर्ज्योतिरूप वन में ही समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध कर ब्रह्म का एकमात्र चिन्तन करता है, इस तरह वह वानप्रस्थ है, केवल वन में हरिण की तरह निवास करने से कोई वानप्रस्थ नहीं होता है। सर्वज्ञत्व-उपाधिसहित परमात्मा और अल्पज्ञत्वउपाधिसहित जीवात्मा की निरुपाधि अखण्ड आत्मस्वरूप में अभेदता की प्रतीति करनेवाला अवधूत योगी अपने समस्त संकल्प का ज्योतिःस्वरूप आत्माः(परमात्मा) में न्यास कर देता है, वह संन्यासी कहा जाता है ।।३४-३७।। मायाकर्मकलाजालमनिशं येन दण्डितम् । अचलो नगवद् भाति त्रिदण्डी सोऽभिधीयते । ३८ । एकं नानाविधाकारं चञ्चलन्तु सदा तु यत् । तच्चित्तं दण्डितं येन एकदण्डी स कथ्यते । ३९ । शुद्धं शान्तं निराकारं परानन्दं सदोदितम् । तं शिवं यो विजानाति शुद्ध शैवो भवेत्तु सः । ४० । सन्तापयति दीप्तानि स्वेन्द्रियाणि च यः सदा । तापसः स तु विज्ञेयो न च गोभस्मधारकः । ४१ । क्रियाजालं पशुं हत्वा पतित्वं पूर्णतां गतम् । यस्तिष्ठेत् पशुभावेन स वै पाशुपतो भवेत् । ४२ । संन्यास-आश्रम में बाँस के तीन दण्ड धारण करने वाला त्रिदण्डी संन्यासी कहा जाता है, वह माया (अविद्या), कर्म (धर्म-अधर्म) और कलाजाल (प्राणादि लिंग-शरीर) के बन्धनका तत्वज्ञान द्वारा:निवारण कर देता है और अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में पर्वत के समान अचल—दृढ़ हो जाता है, इस तरह योगी त्रिदण्डी कहलाता है, केवल बाँस के तीन दण्ड (बाह्य संन्यास-चिह्न के रूप में) धारण करनेवाला त्रिदण्डी नहीं होता। जो अनेक संकल्प-विकल्प में भ्रमित, अनेक राग-द्वेष आदि वृत्तियों में चञ्चल रहता है, उस चित्त को नियन्त्रित—वश में करनेवाला योगी ही एकदण्डी संन्यासी कहा जाता है। जो शुद्ध (गुणातीत, निर्विकार), निराकार (अलख-निरञ्जन सर्वव्यापक), परमानन्द-स्वरूप, स्वप्रकाशित (स्वसंवेद्य अखण्ड परब्रह्म) परमेश्वर (.शिव) को तत्वतः जान लेता है, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५३

वही अवधूत योगी शैव है । जो विषय-भोग में उद्दीप्त-रागासक्त समस्त इन्द्रियों को प्रत्याहारित ( नियन्त्रित ) कर अखण्ड आत्मस्वरूप में लीन कर देता है, वही योगी तपस्वी ( तापस ) 'कहलाता है, अंगों को भस्म से रञ्जित करने वाला तापस नहीं होता । जो कर्मजालरूप पशुत्व ( जीवभाव ) का त्याग कर अखण्ड, परात्पर, पूर्णतम परमशिव की उपासना में तत्पर होकर शिवरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, वही वास्तव में पाशुपत ( शैव ) है ॥ ३८-४२ ॥ परानन्दमयं लिङ्गं निजपीठे सदाऽचले । तल्लिङ्गं पूजितं येन स वै कालमुखो भवेत् । ४३ । विलयं सर्वतत्त्वानां कृत्वा संधार्यते स्थिरम् । सर्वदा येन वीरेण लिङ्गधारी भवेत्तु सः । ४४ । अन्तकादीनि तत्त्वानि त्यक्त्वा मग्नो दिगम्बरः । यो निर्वाणपदे लीनः स निर्वाणपरो भवेत् । ४५ । स्वस्वरूपामकं ज्ञानं समन्त्रं तत् प्रपालितम् । अनन्यत्वं सदा येन स वैकापालिको भवेत् । ४६ । जो सच्चिदानन्दस्वरूप, संसार का कारणरूप अपने नित्यधाम में सदा स्थित है, उस लिङ्ग ( परमेश्वर शिव ) की पुष्पचन्दनादि से उपासना-पूजा करने वाला कालमुख कालजयी महाकाल का उपासक कहलाता है । जो समस्त भौतिक तत्व के प्रति विद्यमान अहंकार-भाव का—संसाराभिमानरूप शत्रु का वीरतापूर्वक दमन कर देता है, वही वीरशैव—लिङ्गधारी कहा जाता है । जन्म- मरण आदि विनश्वर वस्तुओं का परित्याग कर संसारात्मक आवरण से जो रहित होता है तथा परब्रह्म परमेश्वर में लीन रहता है, वही दिगम्बर, निर्वाण में स्वस्थ—निर्वाणी संन्यासी कहा जाता है । जो गुरु से मन्त्र प्राप्त कर उनके द्वारा उपदिष्ट साधन-मार्ग पर चलते हुए अपने शिवस्वरूप में बोधयुक्त तथा अनन्य रहता है, एकमात्र अपने उपास्य का ही ध्यान और चिन्तन करता है, वही कापालिक कहा जाता है ॥ ४३-४६ ॥ महाव्याप्तिपरं तत्त्वमाधाराधेयवर्जितम् । तद् व्रतं धारितं येन स भवेद् वै महाव्रतः । ४७ । १५४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

कुलं सर्वात्मकं पिण्डमकुलं सर्वतोमुखम् । तयोरैक्यपदं शक्तिर्यस्तां वेद स शक्तिभाक् । ४८ । कौलं सर्वकलाग्रासः सकृतः सततं यया । तां शक्तिं यो विजानाति शक्तिज्ञानी स कथ्यते । ज्ञात्वा कुलाकुलं तत्वं सक्रमेण क्रमेण तु । स्वप्रकाशमहाशक्त्या ततः शक्तिपदं लभेत् । ४९ । अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविलक्षण, आधार-आधेयरहित ( सर्वव्यापक ), अखण्ड, अविनाशी परमशिव की उपासना का व्रती होने से ( इस तरह का उपासक ) महाव्रती कहा जाता है । पिण्डरूप, कार्यात्मक ( सर्वात्मक ) समष्टि- सृष्टिरूप ( शिव ) ही कुल है, अखण्ड चिद्रूप, अपने में ही निजाशक्ति को संवरित करनेवाला ( शिव ) अकुल है, कुल-अकुलरूपिणी शक्ति—कुल-अकुल की एकता की महाकारणशक्ति को जाननेवाला ही शक्ति-उपासक ( शाक्त ) कहा जाता है । जिस शक्ति के द्वारा नित्य प्राणादिवस्तु उपादानरूप समस्त कलाओं का ग्रास-विलय कर दिया जाता है, उस प्रलयकारिणी ( महाकाली ) को जानने वाला ःशक्तिज्ञानी कहा जाता है । क्रमपूर्वक कुल-अकुल शक्ति से तादात्म्य स्थापित करनेवाला ( उपासक ) शक्तिपद को प्राप्त करता है अथवा कुलाकुलतत्व को यथाक्रम जानकर उसी क्रम से स्वप्रकाशचिद्रूपिणी महाशक्ति में ( स्वाधिष्ठानपूर्वक ) ऐक्य स्थापित करनेवाला साधक शक्तिपद में स्थित होता है ॥ ४७-४९ ॥ मदो मद्य मतिर्मुद्रा माया मीनं मनः पलम् । मूच्छैनं मैथुनं यस्य तेनासौ शाक्त उच्यते । ५० । ( तन्त्र-उपासना के क्षेत्र में वामाचार में मद्य, मुद्रा, मीन, मांस और मैथुन, पंचमकार का सेवन विहित सिद्ध करनेवाले वाममार्गियों ने समाज में साधन सम्बन्धी सत्स्वरूप की प्राप्ति के प्रति व्यामोह उत्पन्न कर दिया । महायोगी गोरखनाथजी ने इस व्यामोह का खण्डन किया । ) जीव का अहंकार से प्रेरित होकर अपने को ही सर्वशक्तिमान् मानना ही मद अथवा अभिमान है, यही मद्य है । जीव की कामना—अभिलाषा-पूर्ति की इच्छा अथवा मति ही मुद्रा है, शष्कुली ( पूड़ी ) के रूप में मुद्रा का अर्थ नहीं घटित होता है । इसी तरह सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५५

माया ही मीन-मछली है, जल में रहनेवाली मछली से तात्पर्य नहीं सिद्ध होता । मन ही मांस ( पल ) है और प्राण-अपान का ऐक्य ही मैथुन है अथवा शिव और शक्ति की अखण्ड स्वरूपता में आत्माभिव्यक्ति ही मैथुन है । मद, माया, मन, मुद्रा और मैथुन को महाशक्ति में समर्पित करने वाला ही शाक्त है। ऐसा करने से वह स्वरूप में स्वस्थ हो जाता है । पंचमकार-सेवन के इस सात्त्विक रूप से जीवात्मा शाक्त कहा जाता है ॥ ५० ॥ यया भासस्फुरद्रूपं कृतं चैव स्फुटं बलात् । तां शक्तिं यो विजानाति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते । ५१ । यः करोति निरुत्थानं कर्तृ चित् प्रसरेत् सदा ! तद्विश्रान्तिस्तया शक्त्या शाक्तः सोऽत्राभिधीयते । ५२ । व्यापकत्वे परं सारं यद्विष्णोराद्यमव्ययम् । विश्रान्तिदायकं देहे तज्ज्ञात्वा वैष्णवो भवेत् । ५३ । भास्वत्स्वरूपो यो भेदात् भेदभावोज्झितः खलु । भाति देहे सदा यस्य स वै भागवतो भवेत् । ५४ । यो वेत्ति वैष्णवं भेदैः सर्वसर्वमयं निजम् । प्रबुद्धं सर्वदेहस्थं भेदवादी भवेत्तु सः । ५५ । पञ्चानामक्षया हानिः पञ्चत्वं रात्रिरुच्यते । तां रात्रिं यो विजानाति स भवेत् पाञ्चरात्रिकः । ५६ । जिस शक्ति के द्वारा हठात् प्रकाशसंचारक्रियाविशिष्ट जगत् की रचना-- सृष्टि की गयी और ब्रह्मरूप प्रकाशित हुआ, उस शक्ति को जो जान जाता है, वह शाक्त कहा जाता है । जो शक्ति को संचार से संकोच कर निरुत्थानस्वरूपस्थिति- चित्त-विश्रान्ति में समाधि में तत्पर होकर अपने अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूप में विहार करता है, वही शाक्त कहा जाता है । जो चराचर--समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त विष्णुपद--अलख निरञ्जन तत्त्व को अपने व्यष्टि-पिण्ड में ही स्थित और अभेद रूप से अभिव्यक्त जानता है, वही वैष्णव कहलाता है । जो स्वप्रकाशरूप भेदातीत होकर सर्वत्र अभेद रूप से व्यापक भगवत्तत्त्व है, उसको जो अपने व्यष्टि पिण्ड में परिव्याप्त--प्रकाशित अनुभव करता है, वही भागवत कहा जाता है । १५६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

जो व्यष्टि-समष्टि में स्वप्रकाशित अखण्ड सर्वात्मस्वरूप को उपासना के स्तर पर विभिन्न रूप में उपास्य समझता है, वह भेदवादी कहा जाता है । पाञ्चभौतिक स्थूल रूप का तिरोधान अथवा प्रलय ही पाञ्चरात्र ( परमात्मज्ञान ) कहा जाता है । ( विभिन्न वैष्णवागम-जयाख्यसंहिता, पारमेश्वर-संहिता तथा नारदपाञ्चरात्र आदि ग्रन्थों में वर्णित ) इस पाञ्चरात्रस्वरूप ज्ञान को जानने वाला पाञ्चरात्रिक कहा जाता है ॥ ५१–५६ ॥ येन जीवन्ति जीवा वै मुक्तिं यन्ति च तत्क्षणात् । स जीवो विदितो येन सदाजीवो स कथ्यते । ५७ । यः करोति सदा प्रीतिं प्रसन्ने पुरुषे परे । शासितानीन्द्रियाण्येव सात्त्विकः सोऽभिधीयते । ५८ । सर्वाकारं निराकारं निर्निमित्तं निरञ्जनम् । सूक्ष्मं हंसं च यो वेत्ति स भवेत् सूक्ष्मसात्त्विकः । ५९ । सत्यमेकमजं नित्यमनन्तं चाक्षयं ध्रुवम् । ज्ञात्वा यस्तु वदेद्धीरः सत्यवादी स कथ्यते । ६० । ज्ञानज्ञेयमयाभ्यां तु योगनः स्वस्वभावतः । कलङ्का स तु विज्ञेयो व्यापकः पुरुषोत्तमः । ६१ । जीवात्मा जिस चैतन्य के बल से जगत् में जन्म लेकर--शरीर प्राप्त कर जीवित रहता है और क्षणमात्र में ( आत्मज्ञान होने पर ) स्वरूप में स्थित होकर मुक्तिपद को प्राप्त होकर चैतन्यस्वरूप हो जाता है, उस परमात्मा से अभिन्न जीवस्वरूप को जो जान लेता है, वह जन्म-मरण दुःख से छुटकारा पाकर सदाजीवी--अमर कहा जाता है । जो परमपुरुष परमात्मा से प्रेम करता है और समस्त विषय-प्रपञ्चमयी इन्द्रियों की क्रिया को परमात्मा में लीन कर देता है; वह सात्त्विक कहलाता है । जो समस्त नामरूप में अभिव्यक्त–सर्वाकार और निराकार है, कारणातीत स्वरूप में अभिव्यक्त निरञ्जन–मायोपाधिरहित परब्रह्म परमेश्वर है, जो हंस - शक्तिशिवरूप परमात्मा है, उसको तत्वतः जान लेने वाला सूक्ष्म–सात्त्विक कहा जाता है । जो अखण्ड, अनन्त सत्स्वरूप, नित्य, अक्षय, ध्रुव ( अच्युत--स्वरूप में ही अभिव्यक्त ) निष्क्रिय, अभेद परमात्मा को जानकर तत्व का उपदेश देता है, वहो सत्यवादी कहा जाता है । मानस और सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५७