भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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माया ही मीन-मछली है, जल में रहनेवाली मछली से तात्पर्य नहीं सिद्ध होता । मन ही मांस ( पल ) है और प्राण-अपान का ऐक्य ही मैथुन है अथवा शिव और शक्ति की अखण्ड स्वरूपता में आत्माभिव्यक्ति ही मैथुन है । मद, माया, मन, मुद्रा और मैथुन को महाशक्ति में समर्पित करने वाला ही शाक्त है। ऐसा करने से वह स्वरूप में स्वस्थ हो जाता है । पंचमकार-सेवन के इस सात्त्विक रूप से जीवात्मा शाक्त कहा जाता है ॥ ५० ॥ यया भासस्फुरद्रूपं कृतं चैव स्फुटं बलात् । तां शक्तिं यो विजानाति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते । ५१ । यः करोति निरुत्थानं कर्तृ चित् प्रसरेत् सदा ! तद्विश्रान्तिस्तया शक्त्या शाक्तः सोऽत्राभिधीयते । ५२ । व्यापकत्वे परं सारं यद्विष्णोराद्यमव्ययम् । विश्रान्तिदायकं देहे तज्ज्ञात्वा वैष्णवो भवेत् । ५३ । भास्वत्स्वरूपो यो भेदात् भेदभावोज्झितः खलु । भाति देहे सदा यस्य स वै भागवतो भवेत् । ५४ । यो वेत्ति वैष्णवं भेदैः सर्वसर्वमयं निजम् । प्रबुद्धं सर्वदेहस्थं भेदवादी भवेत्तु सः । ५५ । पञ्चानामक्षया हानिः पञ्चत्वं रात्रिरुच्यते । तां रात्रिं यो विजानाति स भवेत् पाञ्चरात्रिकः । ५६ । जिस शक्ति के द्वारा हठात् प्रकाशसंचारक्रियाविशिष्ट जगत् की रचना-- सृष्टि की गयी और ब्रह्मरूप प्रकाशित हुआ, उस शक्ति को जो जान जाता है, वह शाक्त कहा जाता है । जो शक्ति को संचार से संकोच कर निरुत्थानस्वरूपस्थिति- चित्त-विश्रान्ति में समाधि में तत्पर होकर अपने अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूप में विहार करता है, वही शाक्त कहा जाता है । जो चराचर--समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त विष्णुपद--अलख निरञ्जन तत्त्व को अपने व्यष्टि-पिण्ड में ही स्थित और अभेद रूप से अभिव्यक्त जानता है, वही वैष्णव कहलाता है । जो स्वप्रकाशरूप भेदातीत होकर सर्वत्र अभेद रूप से व्यापक भगवत्तत्त्व है, उसको जो अपने व्यष्टि पिण्ड में परिव्याप्त--प्रकाशित अनुभव करता है, वही भागवत कहा जाता है । १५६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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