सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो व्यष्टि-समष्टि में स्वप्रकाशित अखण्ड सर्वात्मस्वरूप को उपासना के स्तर पर विभिन्न रूप में उपास्य समझता है, वह भेदवादी कहा जाता है । पाञ्चभौतिक स्थूल रूप का तिरोधान अथवा प्रलय ही पाञ्चरात्र ( परमात्मज्ञान ) कहा जाता है । ( विभिन्न वैष्णवागम-जयाख्यसंहिता, पारमेश्वर-संहिता तथा नारदपाञ्चरात्र आदि ग्रन्थों में वर्णित ) इस पाञ्चरात्रस्वरूप ज्ञान को जानने वाला पाञ्चरात्रिक कहा जाता है ॥ ५१–५६ ॥ येन जीवन्ति जीवा वै मुक्तिं यन्ति च तत्क्षणात् । स जीवो विदितो येन सदाजीवो स कथ्यते । ५७ । यः करोति सदा प्रीतिं प्रसन्ने पुरुषे परे । शासितानीन्द्रियाण्येव सात्त्विकः सोऽभिधीयते । ५८ । सर्वाकारं निराकारं निर्निमित्तं निरञ्जनम् । सूक्ष्मं हंसं च यो वेत्ति स भवेत् सूक्ष्मसात्त्विकः । ५९ । सत्यमेकमजं नित्यमनन्तं चाक्षयं ध्रुवम् । ज्ञात्वा यस्तु वदेद्धीरः सत्यवादी स कथ्यते । ६० । ज्ञानज्ञेयमयाभ्यां तु योगनः स्वस्वभावतः । कलङ्का स तु विज्ञेयो व्यापकः पुरुषोत्तमः । ६१ । जीवात्मा जिस चैतन्य के बल से जगत् में जन्म लेकर--शरीर प्राप्त कर जीवित रहता है और क्षणमात्र में ( आत्मज्ञान होने पर ) स्वरूप में स्थित होकर मुक्तिपद को प्राप्त होकर चैतन्यस्वरूप हो जाता है, उस परमात्मा से अभिन्न जीवस्वरूप को जो जान लेता है, वह जन्म-मरण दुःख से छुटकारा पाकर सदाजीवी--अमर कहा जाता है । जो परमपुरुष परमात्मा से प्रेम करता है और समस्त विषय-प्रपञ्चमयी इन्द्रियों की क्रिया को परमात्मा में लीन कर देता है; वह सात्त्विक कहलाता है । जो समस्त नामरूप में अभिव्यक्त–सर्वाकार और निराकार है, कारणातीत स्वरूप में अभिव्यक्त निरञ्जन–मायोपाधिरहित परब्रह्म परमेश्वर है, जो हंस - शक्तिशिवरूप परमात्मा है, उसको तत्वतः जान लेने वाला सूक्ष्म–सात्त्विक कहा जाता है । जो अखण्ड, अनन्त सत्स्वरूप, नित्य, अक्षय, ध्रुव ( अच्युत--स्वरूप में ही अभिव्यक्त ) निष्क्रिय, अभेद परमात्मा को जानकर तत्व का उपदेश देता है, वहो सत्यवादी कहा जाता है । मानस और सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५७