भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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ग्रस्ते स्ववेगनिचये पदपिण्डमैक्यं सत्यं भवेत्समरसं गुरुवत्सलानाम् ॥ ८४ ॥ बुद्धिवृत्ति के विस्तार के उदयस्वरूप चिद्विलास-आत्मप्रकाश में ही गुरु के अनुग्रहप्राप्त शिष्यों में मानसव्यापार के निरुद्ध होने पर विश्रान्ति की स्थिति सम्भव होती है, उस विश्रान्ति में समष्टि-व्यष्टिरूप पदपिण्ड का ऐक्य-सामरस्य स्थापित होता है । जीवात्मारूप शिष्य परमात्मपद में गुरु की कृपा से अभेद-अभिन्न हो जाते हैं, उन्हें अखण्ड परमात्मस्वरूप-परमात्मपद अथवा परमपद की प्राप्ति हो जाती है ८४ ॥ इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ पञ्चमोपदेशः ॥ 卐 १४२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति