भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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छठा उपदेश [ अवधूत योगी ] अथ कोऽवधूतयोगिनामेत्यपेक्षायामाह । यः सर्वान् प्रकृतिविकारानवधुनोतीत्यवधूत योगी । योगोऽस्यास्तीति धूञ्कम्पने धूजिति धातुः कम्पनार्थे वर्तते । कम्पनं चालनं देहदैहिकप्रपञ्चादिषु विषयेषु सङ्गतं मनः परिगृह्य तेभ्यः प्रत्याहृत्य स्वधाममहिम्नि परलीनचेताः प्रपञ्चशून्य आदिमध्यान्तनिधनभेदवर्जितः ॥ १ ॥ ( सद्गुरु से सदुपदेशामृत प्राप्त कर व्यष्टि-पिण्ड और ब्रह्माण्ड में जीवात्मा-परमात्मा का सामरस्य स्थापित कर सिद्धि प्राप्त करने पर नित्य अवधूत स्वरूप की प्राप्ति होती है । ) अवधूत योगी का स्वरूप क्या है, इस जिज्ञासा के समाधान के लिये अवधूत के लक्षण का वर्णन किया जाता है । जो समस्त प्रकृति-विकार-देह, इन्द्रिय, मन और अनात्मसम्बन्धरूप विषयप्रपञ्चादि मलों का अवधूनन-त्याग कर निर्मल स्वरूप में संस्थित हो जाता है, वही अवधूत योगी है । धूञ् धातु 'कम्पन, चालन' अर्थ में प्रयुक्त होता है, जिसका आशय यह है कि दैहिक प्रपञ्चादिविषयों में आसक्त मन को निगृहीत कर उन विषयों से प्रत्याहारित कर-हटाकर प्रपञ्चरहित होकर तथा जन्म-मरण आदि दुःखों से-द्वन्द्वात्मक परिस्थितियों से छुटकारा पाकर अपने अखण्ड ज्ञानस्वरूप परम शिव में ( सामरस्य के द्वारा ) तल्लीनचित्त योगी ही नित्य अवधूत है ॥ १ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४३