सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयकारो वायुबीजं स्याद्रकारो वह्निबीजकम् । तयोरभेद्योंकारश्चिदाकारः प्रकीर्तितः ॥ २ ॥ 'य' वायु का बीज है, 'र' अग्नि का बीज है, दोनों का ऐक्य—सामरस्य ही चिद्रूप ओंकार 'ॐ कहा जाता है ॥ २ ॥ विशेष—तन्त्र में शिव को बिन्दु और शक्ति को बीज कहा गया है । इस तरह महायोगी गोरखनाथ ने अपने योगग्रन्थों में जहाँ पाँच भूत-तत्त्व, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की धारणा का निर्देश किया है, वहीं उनके बीज का भी क्रमश 'ल' 'व', 'र' 'य' और ह' का वर्णन किया है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति के उपर्युक्त दूसरे श्लोक में 'य' और 'र' बीज के कथनका आशय है सभी तत्त्वों के 'बीज' का ग्रहण । पाँच भूतों का लय अपने 'बीज' में स्थापित होता है और चिद्रूप बीज का लय ऊंकार-प्रणव में होता है । ओंकार-ॐकार ही समस्त बीज मन्त्र और शब्दों का उपादान कारण है । इस तरह चिद्रूपा शक्ति से ऊंकार प्रणव का तादात्म्य ही शक्ति और शिव की अभेदता—एकता अथवा समरसता है । इस सामरस्यसे योगी दिव्य शरीर वाला हो जाता है । भगवान् शिव का प्रकारान्तर से कथन है । अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा । योगिनां साधनावस्था भवेद् दिव्यं वपुस्तदा ॥ ( शिवसंहिता ४ । ८७ ) तदेतद् व्यक्तमुच्यते— क्लेशपागत रङ्गाणां कृन्तनेन विमुण्डनम् । सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ३ ॥ जो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, पंचक्लेशरूपी जाल के वेग का उच्छेद कर देता है और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में प्रपञ्च से मुक्त हो जाता है, वही (आत्मस्वरूप में स्थित ) योगी अवधूत कहा जाता है ॥ ३ ॥ निजस्मरविभूतिर्यो योगी स्वाङ्गे विभूषितः । आधारे यस्य वा रूढिः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ४ ॥ १४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति