भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 222 में से

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सर्वाङ्गप्रणिपातेन स्तुवन्नित्यं गुरुं व्रजेत् । स जनः स्थैर्यमाप्नोति स्वस्वरूपमयो भवेत् ।। ८० ।। निरुत्थान के द्वारा परमपद में स्वस्थ गुरु के अनुग्रह से शिष्य जन्ममरण दुःखरूप ( यातनामय ) संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है, वह अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित होकर इन्द्रियादि के व्यामोह से मुक्त होकर शिवस्वरूप में प्रतिष्ठत हो जाता है । ऐसा गुरु करोड़ों कुल की सन्तानों ( योगियों ) का उद्धार कर देता है । इसलिये सदा-नित्यदण्डवत् प्रणामपूर्वक स्तवन करते हुए गुरु का ( विधिपूर्वक ) अभिवन्दन करना चाहिये । ऐसा शिष्य ( समर्थ सद्गुरु के शरणागत होकर ) परमात्मपद में अखण्ड स्वरूप में स्थित हो जाता है ।। ८० ।। किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतेन च । दुर्लभा चित्तविश्रान्तिर्विना गुरुकृपां पराम् ।। ८१ ।। चित्तविश्रान्तिलब्धानां योगिनां दृढ़चेतसाम् । स्वस्वरूपे निमग्नानां निरुत्थानं विशेषतः ।। ८२ ।। निमिषात् प्रस्फुटं भाति दुर्लभं परमं पदम् । यस्मिन् पिण्डो भवेल्लीनः सहसा नात्र संशयः ।। ८३ ।। इस सम्बन्ध में अधिक क्या कहा जाय । करोड़ों-करोड़ों शास्त्रका अध्ययन करने से भी विना गुरुकी कृपा प्राप्त किये चित्तवृत्तिनिरोधपूर्वक आत्मशान्ति ( विश्रान्ति ) दुर्लभ है । चित्तविश्रान्ति प्राप्त होने पर ही दृढ़ योगसाधन में तत्पर आत्मस्वरूप में निमग्न योगी को निरुत्थान—स्वबोध ( जागरण ) सुलभ होता है । निरुत्थान के परिणामस्वरूप तत्काल ही दुर्लभ परमपद प्रकाशित ( प्रत्यक्ष ) हो जाता है । इस परमपद में व्यष्टि-पिण्ड और परमात्म पिण्ड—ब्रह्माण्ड में सामरस्य स्थापित होता है । इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।। ८१-८३ ।। संवित्क्रियाविकरणोदयचिद्विलासो विश्रान्तिमेव भजतां स्वयमेव भाति । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४१

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