सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशिलया किं परं पारं शिलासंघः प्रतार्यते । स्वयंतीर्णो भवेद्योऽसौ परान्निस्तारयत्यलम् ॥ ७४ ॥ जिस तरह (नदी के प्रवाह में) पड़ी शिला (धारामें प्रवाहित) अन्य शिलाओं को वहाकर उस पार उन्हें नहीं उतार सकती, उसी तरह जो स्वयं पार होने में , असमर्थ है, वह दूसरों को पार नहीं कर सकता है अथवा तारने में असमर्थ है । जो स्वयं तर जाने में समर्थ है, वही दूसरों को भी पार उतार सकता है ॥ ७४ ॥ विकल्पसागराद् घोराच्चिन्ताकल्लोलदुस्तरात् । प्रपञ्चवासन!दुष्टग्रहजालसमाकुलात् ॥ ७५ ॥ वासनालहरीवेगान्न स्वं तारयितुं क्षमः । स्वस्थेनैवोपदेशेन निरुत्थानेन तत्क्षणात् ॥ ७६ ॥ तारयत्येवदृक्पातात् कथनाद्वा विलोकनात् । तारिते स्वपदं धत्ते स्वस्वमध्ये स्थिरो भवेत् ॥ ७७ ॥ यह संसार एक दुस्तर सागर है, विषयवासनारूप संकल्प-विकल्पस्वरूप चञ्चलता से उद्वेलित है, यह बड़ा भीषण है, चिन्ता की लहरियाँ इसमें निरन्तर उठती रहती हैं, यह दुष्ट ग्राहों से पूर्ण जालरूप ममता-मोह आदि से आकुल है, विषय-वासनायें ही इसमें लहरियाँ हैं । इस संसार-सागर को जो तैर कर पार उतरने में समर्थ नहीं है, वह किस तरह दूसरों को पार उतार सकता है । जो अपने अखण्ड आत्मस्वरूपमें स्थित है, वही निरुत्थान ( जीवात्मा—परमात्मा में सामरस्य ) स्थापित कर शिष्य को सदुपदेश प्रदान कर कृपामयी दृष्टिपात कर अथवा ज्ञान प्रदान कर तारने में--भवसागर से पार उतारने में समर्थ है । वह स्वरूपस्थिति से परम पद में अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाता है, शिष्यको भवसागर से पार उतार देता है ॥ ७७ ॥ ततः स मुच्यते शिष्यो जन्मसंसारबन्धनात् । परानन्दमयोभूत्वा निष्कलः शिवतां व्रजेत् । ७८ ॥ कुलानां कोटिकोटीनां तारयत्येव तत्क्षणात् । अतस्तु सद्गुरुं साक्षात् त्रिकालमभिवन्दयेत् ॥ ७६ ॥ १४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति