सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्त सूत्र इसी को परमानन्दस्वरूप परमात्मा कह कर प्रतिपादित करते हैं। इस तरह विभिन्न दर्शनों में व्यवहृत नाम-रूपों में अभिव्यक्त सत्स्वरूप है। यह आनन्द प्रदान करता है और जीवात्मा-परमात्मा के ऐक्य-स्वरूप अथवा सामरस्य का यह आत्मतत्व परम सत्य है, दोनों की अखण्ड ज्ञानस्वरूपावस्थिति—संवित्ति मुद्रा के रूप में परिकीर्तित—प्रसिद्ध है। (मुद्रा में मुद् का अर्थ है आनन्द और रा का अर्थ है प्रदान करना।) मुद्रा (वाह्य चिह्न के रूप में) योगी अपने कानों में धारण कर देवताओं को प्रसन्न कर कल्याणभाजन होते हैं और असुरों को भयभीत—कम्पित (द्रवित) करते हैं अथवा देवता आनन्दित होते हैं और असुर भयभीत होकर भाग जाते हैं। इस योगमार्ग—सिद्धामृत मार्ग में जो सद्गुरुद्वारा दीक्षित—उपदिष्ट नहीं हैं और संसार के विषय-भोगादि प्रपंच में रागासक्त हैं तथा संसार को ही रमणीय समझ कर आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में विस्मृत होते हैं, वे ही पाखण्डी—मिथ्यावादी कहलाते हैं। अवधूत योगी तो अपने योगज्ञान के प्रकाश से समस्त आत्मसम्बन्धी तत्वज्ञान में स्वरूप का बोध प्राप्त कर अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में संस्थित होकर आत्मतत्व को प्रकाशित करता है॥ २५–३३॥ सर्वतो भरिताकारं निजबोधेन बृंहितम्। चरते ब्रह्मविद्यस्तु ब्रह्मचारी स कथ्यते। ३४। गृहिणी पूर्णता नित्या गेहं व्योमं सदा बलम्। यस्तया नित्रसत्यत्र गृहस्थः सोऽभिधीयते। ३५। तदान्तः प्रस्थितो योऽसौ स्वप्रकाशमये वने। वानप्रस्थः स विज्ञेयो न वने मृगवच्चरन्। ३६। परमात्माऽथ जीवात्मा आत्मन्येव स्फुरत्यलम्। तस्मिन्न्यस्त सदा येन संन्यासीसोऽभिधीयते। ३७। अत्याश्रमी—आश्रम धर्मपालन की मर्यादा से परे अवधूत योगी सर्वभाव से ब्रह्मस्वरूप में अखण्ड ज्ञानयुक्त आत्मबोध से पूर्ण होकर ब्रह्मज्ञानी—साक्षात् ब्रह्मरूप होने से ब्रह्मचारी कहा जाता है। वह यद्यपि अनिकेत, पवित्रात्मा और योगसाधना में ही नित्य तृप्त होता है तथापि वह गृहस्थ कहा जाता है, क्योंकि पूर्णता—अखण्ड ब्रह्मरूपता ही उसकी जीवन-संगिनी अथवा सहधर्मिणी है, १५२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति