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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

वेदान्त सूत्र इसी को परमानन्दस्वरूप परमात्मा कह कर प्रतिपादित करते हैं। इस तरह विभिन्न दर्शनों में व्यवहृत नाम-रूपों में अभिव्यक्त सत्स्वरूप है। यह आनन्द प्रदान करता है और जीवात्मा-परमात्मा के ऐक्य-स्वरूप अथवा सामरस्य का यह आत्मतत्व परम सत्य है, दोनों की अखण्ड ज्ञानस्वरूपावस्थिति—संवित्ति मुद्रा के रूप में परिकीर्तित—प्रसिद्ध है। (मुद्रा में मुद् का अर्थ है आनन्द और रा का अर्थ है प्रदान करना।) मुद्रा (वाह्य चिह्न के रूप में) योगी अपने कानों में धारण कर देवताओं को प्रसन्न कर कल्याणभाजन होते हैं और असुरों को भयभीत—कम्पित (द्रवित) करते हैं अथवा देवता आनन्दित होते हैं और असुर भयभीत होकर भाग जाते हैं। इस योगमार्ग—सिद्धामृत मार्ग में जो सद्गुरुद्वारा दीक्षित—उपदिष्ट नहीं हैं और संसार के विषय-भोगादि प्रपंच में रागासक्त हैं तथा संसार को ही रमणीय समझ कर आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में विस्मृत होते हैं, वे ही पाखण्डी—मिथ्यावादी कहलाते हैं। अवधूत योगी तो अपने योगज्ञान के प्रकाश से समस्त आत्मसम्बन्धी तत्वज्ञान में स्वरूप का बोध प्राप्त कर अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में संस्थित होकर आत्मतत्व को प्रकाशित करता है॥ २५–३३॥ सर्वतो भरिताकारं निजबोधेन बृंहितम्। चरते ब्रह्मविद्यस्तु ब्रह्मचारी स कथ्यते। ३४। गृहिणी पूर्णता नित्या गेहं व्योमं सदा बलम्। यस्तया नित्रसत्यत्र गृहस्थः सोऽभिधीयते। ३५। तदान्तः प्रस्थितो योऽसौ स्वप्रकाशमये वने। वानप्रस्थः स विज्ञेयो न वने मृगवच्चरन्। ३६। परमात्माऽथ जीवात्मा आत्मन्येव स्फुरत्यलम्। तस्मिन्न्यस्त सदा येन संन्यासीसोऽभिधीयते। ३७। अत्याश्रमी—आश्रम धर्मपालन की मर्यादा से परे अवधूत योगी सर्वभाव से ब्रह्मस्वरूप में अखण्ड ज्ञानयुक्त आत्मबोध से पूर्ण होकर ब्रह्मज्ञानी—साक्षात् ब्रह्मरूप होने से ब्रह्मचारी कहा जाता है। वह यद्यपि अनिकेत, पवित्रात्मा और योगसाधना में ही नित्य तृप्त होता है तथापि वह गृहस्थ कहा जाता है, क्योंकि पूर्णता—अखण्ड ब्रह्मरूपता ही उसकी जीवन-संगिनी अथवा सहधर्मिणी है, १५२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सर्वव्यापक शून्य (व्योम) ही. उसका निवास है. अथवा वह ब्रह्म—अलख निरञ्जन परमेश्वर में स्वशक्ति से स्वस्थ अथवा अधिष्ठित होता है। स्वप्रकाशमय—अखण्ड अन्तर्ज्योतिरूप वन में ही समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध कर ब्रह्म का एकमात्र चिन्तन करता है, इस तरह वह वानप्रस्थ है, केवल वन में हरिण की तरह निवास करने से कोई वानप्रस्थ नहीं होता है। सर्वज्ञत्व-उपाधिसहित परमात्मा और अल्पज्ञत्वउपाधिसहित जीवात्मा की निरुपाधि अखण्ड आत्मस्वरूप में अभेदता की प्रतीति करनेवाला अवधूत योगी अपने समस्त संकल्प का ज्योतिःस्वरूप आत्माः(परमात्मा) में न्यास कर देता है, वह संन्यासी कहा जाता है ।।३४-३७।। मायाकर्मकलाजालमनिशं येन दण्डितम् । अचलो नगवद् भाति त्रिदण्डी सोऽभिधीयते । ३८ । एकं नानाविधाकारं चञ्चलन्तु सदा तु यत् । तच्चित्तं दण्डितं येन एकदण्डी स कथ्यते । ३९ । शुद्धं शान्तं निराकारं परानन्दं सदोदितम् । तं शिवं यो विजानाति शुद्ध शैवो भवेत्तु सः । ४० । सन्तापयति दीप्तानि स्वेन्द्रियाणि च यः सदा । तापसः स तु विज्ञेयो न च गोभस्मधारकः । ४१ । क्रियाजालं पशुं हत्वा पतित्वं पूर्णतां गतम् । यस्तिष्ठेत् पशुभावेन स वै पाशुपतो भवेत् । ४२ । संन्यास-आश्रम में बाँस के तीन दण्ड धारण करने वाला त्रिदण्डी संन्यासी कहा जाता है, वह माया (अविद्या), कर्म (धर्म-अधर्म) और कलाजाल (प्राणादि लिंग-शरीर) के बन्धनका तत्वज्ञान द्वारा:निवारण कर देता है और अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में पर्वत के समान अचल—दृढ़ हो जाता है, इस तरह योगी त्रिदण्डी कहलाता है, केवल बाँस के तीन दण्ड (बाह्य संन्यास-चिह्न के रूप में) धारण करनेवाला त्रिदण्डी नहीं होता। जो अनेक संकल्प-विकल्प में भ्रमित, अनेक राग-द्वेष आदि वृत्तियों में चञ्चल रहता है, उस चित्त को नियन्त्रित—वश में करनेवाला योगी ही एकदण्डी संन्यासी कहा जाता है। जो शुद्ध (गुणातीत, निर्विकार), निराकार (अलख-निरञ्जन सर्वव्यापक), परमानन्द-स्वरूप, स्वप्रकाशित (स्वसंवेद्य अखण्ड परब्रह्म) परमेश्वर (.शिव) को तत्वतः जान लेता है, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५३

वही अवधूत योगी शैव है । जो विषय-भोग में उद्दीप्त-रागासक्त समस्त इन्द्रियों को प्रत्याहारित ( नियन्त्रित ) कर अखण्ड आत्मस्वरूप में लीन कर देता है, वही योगी तपस्वी ( तापस ) 'कहलाता है, अंगों को भस्म से रञ्जित करने वाला तापस नहीं होता । जो कर्मजालरूप पशुत्व ( जीवभाव ) का त्याग कर अखण्ड, परात्पर, पूर्णतम परमशिव की उपासना में तत्पर होकर शिवरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, वही वास्तव में पाशुपत ( शैव ) है ॥ ३८-४२ ॥ परानन्दमयं लिङ्गं निजपीठे सदाऽचले । तल्लिङ्गं पूजितं येन स वै कालमुखो भवेत् । ४३ । विलयं सर्वतत्त्वानां कृत्वा संधार्यते स्थिरम् । सर्वदा येन वीरेण लिङ्गधारी भवेत्तु सः । ४४ । अन्तकादीनि तत्त्वानि त्यक्त्वा मग्नो दिगम्बरः । यो निर्वाणपदे लीनः स निर्वाणपरो भवेत् । ४५ । स्वस्वरूपामकं ज्ञानं समन्त्रं तत् प्रपालितम् । अनन्यत्वं सदा येन स वैकापालिको भवेत् । ४६ । जो सच्चिदानन्दस्वरूप, संसार का कारणरूप अपने नित्यधाम में सदा स्थित है, उस लिङ्ग ( परमेश्वर शिव ) की पुष्पचन्दनादि से उपासना-पूजा करने वाला कालमुख कालजयी महाकाल का उपासक कहलाता है । जो समस्त भौतिक तत्व के प्रति विद्यमान अहंकार-भाव का—संसाराभिमानरूप शत्रु का वीरतापूर्वक दमन कर देता है, वही वीरशैव—लिङ्गधारी कहा जाता है । जन्म- मरण आदि विनश्वर वस्तुओं का परित्याग कर संसारात्मक आवरण से जो रहित होता है तथा परब्रह्म परमेश्वर में लीन रहता है, वही दिगम्बर, निर्वाण में स्वस्थ—निर्वाणी संन्यासी कहा जाता है । जो गुरु से मन्त्र प्राप्त कर उनके द्वारा उपदिष्ट साधन-मार्ग पर चलते हुए अपने शिवस्वरूप में बोधयुक्त तथा अनन्य रहता है, एकमात्र अपने उपास्य का ही ध्यान और चिन्तन करता है, वही कापालिक कहा जाता है ॥ ४३-४६ ॥ महाव्याप्तिपरं तत्त्वमाधाराधेयवर्जितम् । तद् व्रतं धारितं येन स भवेद् वै महाव्रतः । ४७ । १५४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

कुलं सर्वात्मकं पिण्डमकुलं सर्वतोमुखम् । तयोरैक्यपदं शक्तिर्यस्तां वेद स शक्तिभाक् । ४८ । कौलं सर्वकलाग्रासः सकृतः सततं यया । तां शक्तिं यो विजानाति शक्तिज्ञानी स कथ्यते । ज्ञात्वा कुलाकुलं तत्वं सक्रमेण क्रमेण तु । स्वप्रकाशमहाशक्त्या ततः शक्तिपदं लभेत् । ४९ । अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविलक्षण, आधार-आधेयरहित ( सर्वव्यापक ), अखण्ड, अविनाशी परमशिव की उपासना का व्रती होने से ( इस तरह का उपासक ) महाव्रती कहा जाता है । पिण्डरूप, कार्यात्मक ( सर्वात्मक ) समष्टि- सृष्टिरूप ( शिव ) ही कुल है, अखण्ड चिद्रूप, अपने में ही निजाशक्ति को संवरित करनेवाला ( शिव ) अकुल है, कुल-अकुलरूपिणी शक्ति—कुल-अकुल की एकता की महाकारणशक्ति को जाननेवाला ही शक्ति-उपासक ( शाक्त ) कहा जाता है । जिस शक्ति के द्वारा नित्य प्राणादिवस्तु उपादानरूप समस्त कलाओं का ग्रास-विलय कर दिया जाता है, उस प्रलयकारिणी ( महाकाली ) को जानने वाला ःशक्तिज्ञानी कहा जाता है । क्रमपूर्वक कुल-अकुल शक्ति से तादात्म्य स्थापित करनेवाला ( उपासक ) शक्तिपद को प्राप्त करता है अथवा कुलाकुलतत्व को यथाक्रम जानकर उसी क्रम से स्वप्रकाशचिद्रूपिणी महाशक्ति में ( स्वाधिष्ठानपूर्वक ) ऐक्य स्थापित करनेवाला साधक शक्तिपद में स्थित होता है ॥ ४७-४९ ॥ मदो मद्य मतिर्मुद्रा माया मीनं मनः पलम् । मूच्छैनं मैथुनं यस्य तेनासौ शाक्त उच्यते । ५० । ( तन्त्र-उपासना के क्षेत्र में वामाचार में मद्य, मुद्रा, मीन, मांस और मैथुन, पंचमकार का सेवन विहित सिद्ध करनेवाले वाममार्गियों ने समाज में साधन सम्बन्धी सत्स्वरूप की प्राप्ति के प्रति व्यामोह उत्पन्न कर दिया । महायोगी गोरखनाथजी ने इस व्यामोह का खण्डन किया । ) जीव का अहंकार से प्रेरित होकर अपने को ही सर्वशक्तिमान् मानना ही मद अथवा अभिमान है, यही मद्य है । जीव की कामना—अभिलाषा-पूर्ति की इच्छा अथवा मति ही मुद्रा है, शष्कुली ( पूड़ी ) के रूप में मुद्रा का अर्थ नहीं घटित होता है । इसी तरह सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५५

माया ही मीन-मछली है, जल में रहनेवाली मछली से तात्पर्य नहीं सिद्ध होता । मन ही मांस ( पल ) है और प्राण-अपान का ऐक्य ही मैथुन है अथवा शिव और शक्ति की अखण्ड स्वरूपता में आत्माभिव्यक्ति ही मैथुन है । मद, माया, मन, मुद्रा और मैथुन को महाशक्ति में समर्पित करने वाला ही शाक्त है। ऐसा करने से वह स्वरूप में स्वस्थ हो जाता है । पंचमकार-सेवन के इस सात्त्विक रूप से जीवात्मा शाक्त कहा जाता है ॥ ५० ॥ यया भासस्फुरद्रूपं कृतं चैव स्फुटं बलात् । तां शक्तिं यो विजानाति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते । ५१ । यः करोति निरुत्थानं कर्तृ चित् प्रसरेत् सदा ! तद्विश्रान्तिस्तया शक्त्या शाक्तः सोऽत्राभिधीयते । ५२ । व्यापकत्वे परं सारं यद्विष्णोराद्यमव्ययम् । विश्रान्तिदायकं देहे तज्ज्ञात्वा वैष्णवो भवेत् । ५३ । भास्वत्स्वरूपो यो भेदात् भेदभावोज्झितः खलु । भाति देहे सदा यस्य स वै भागवतो भवेत् । ५४ । यो वेत्ति वैष्णवं भेदैः सर्वसर्वमयं निजम् । प्रबुद्धं सर्वदेहस्थं भेदवादी भवेत्तु सः । ५५ । पञ्चानामक्षया हानिः पञ्चत्वं रात्रिरुच्यते । तां रात्रिं यो विजानाति स भवेत् पाञ्चरात्रिकः । ५६ । जिस शक्ति के द्वारा हठात् प्रकाशसंचारक्रियाविशिष्ट जगत् की रचना-- सृष्टि की गयी और ब्रह्मरूप प्रकाशित हुआ, उस शक्ति को जो जान जाता है, वह शाक्त कहा जाता है । जो शक्ति को संचार से संकोच कर निरुत्थानस्वरूपस्थिति- चित्त-विश्रान्ति में समाधि में तत्पर होकर अपने अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूप में विहार करता है, वही शाक्त कहा जाता है । जो चराचर--समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त विष्णुपद--अलख निरञ्जन तत्त्व को अपने व्यष्टि-पिण्ड में ही स्थित और अभेद रूप से अभिव्यक्त जानता है, वही वैष्णव कहलाता है । जो स्वप्रकाशरूप भेदातीत होकर सर्वत्र अभेद रूप से व्यापक भगवत्तत्त्व है, उसको जो अपने व्यष्टि पिण्ड में परिव्याप्त--प्रकाशित अनुभव करता है, वही भागवत कहा जाता है । १५६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

जो व्यष्टि-समष्टि में स्वप्रकाशित अखण्ड सर्वात्मस्वरूप को उपासना के स्तर पर विभिन्न रूप में उपास्य समझता है, वह भेदवादी कहा जाता है । पाञ्चभौतिक स्थूल रूप का तिरोधान अथवा प्रलय ही पाञ्चरात्र ( परमात्मज्ञान ) कहा जाता है । ( विभिन्न वैष्णवागम-जयाख्यसंहिता, पारमेश्वर-संहिता तथा नारदपाञ्चरात्र आदि ग्रन्थों में वर्णित ) इस पाञ्चरात्रस्वरूप ज्ञान को जानने वाला पाञ्चरात्रिक कहा जाता है ॥ ५१–५६ ॥ येन जीवन्ति जीवा वै मुक्तिं यन्ति च तत्क्षणात् । स जीवो विदितो येन सदाजीवो स कथ्यते । ५७ । यः करोति सदा प्रीतिं प्रसन्ने पुरुषे परे । शासितानीन्द्रियाण्येव सात्त्विकः सोऽभिधीयते । ५८ । सर्वाकारं निराकारं निर्निमित्तं निरञ्जनम् । सूक्ष्मं हंसं च यो वेत्ति स भवेत् सूक्ष्मसात्त्विकः । ५९ । सत्यमेकमजं नित्यमनन्तं चाक्षयं ध्रुवम् । ज्ञात्वा यस्तु वदेद्धीरः सत्यवादी स कथ्यते । ६० । ज्ञानज्ञेयमयाभ्यां तु योगनः स्वस्वभावतः । कलङ्का स तु विज्ञेयो व्यापकः पुरुषोत्तमः । ६१ । जीवात्मा जिस चैतन्य के बल से जगत् में जन्म लेकर--शरीर प्राप्त कर जीवित रहता है और क्षणमात्र में ( आत्मज्ञान होने पर ) स्वरूप में स्थित होकर मुक्तिपद को प्राप्त होकर चैतन्यस्वरूप हो जाता है, उस परमात्मा से अभिन्न जीवस्वरूप को जो जान लेता है, वह जन्म-मरण दुःख से छुटकारा पाकर सदाजीवी--अमर कहा जाता है । जो परमपुरुष परमात्मा से प्रेम करता है और समस्त विषय-प्रपञ्चमयी इन्द्रियों की क्रिया को परमात्मा में लीन कर देता है; वह सात्त्विक कहलाता है । जो समस्त नामरूप में अभिव्यक्त–सर्वाकार और निराकार है, कारणातीत स्वरूप में अभिव्यक्त निरञ्जन–मायोपाधिरहित परब्रह्म परमेश्वर है, जो हंस - शक्तिशिवरूप परमात्मा है, उसको तत्वतः जान लेने वाला सूक्ष्म–सात्त्विक कहा जाता है । जो अखण्ड, अनन्त सत्स्वरूप, नित्य, अक्षय, ध्रुव ( अच्युत--स्वरूप में ही अभिव्यक्त ) निष्क्रिय, अभेद परमात्मा को जानकर तत्व का उपदेश देता है, वहो सत्यवादी कहा जाता है । मानस और सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५७

बाह्य-दोनों प्रकार के पदार्थों से परे सर्वव्यापक-कलंकी, योगमायोपाधिविशिष्ट साकार-सगुण परमेश्वर-पुरुषोत्तम ही योगियों के लिये शुद्ध-बुद्ध, मायोपाधिरहित अलख-निरञ्जन परमात्मा है ॥ ५७-६१ ॥ मुक्तिचारे मतिर्या वै व्यापिका स्वप्रकाशिका । एषा ज्ञानवती येन ज्ञातासौ सात्त्विको भवेत् । ६२ । क्षपणं चित्तवृत्तीनां रागद्वेषविलुण्ठनम् । कुरुते व्योमवन्नग्नो योऽसौ क्षपणको भवेत् । प्रसरं भासते शक्तिः सङ्कोचं भासते शिवः । तयोर्योगस्य कर्ता यः स भवेत्सिद्धयोगिराट् । ६३ । मोक्षप्राप्ति के अनुष्ठान में स्वप्रकाशमयी, ज्ञानवती अखण्ड बुद्धि में जिसकी मति निरन्तर तल्लीन है, वही सात्त्विक कहा जाता है । जो रागद्वेष का उन्मूलन कर चित्त की वृत्तियों का ( योगानुष्ठान के द्वारा ) निरोध कर लेता है, वही क्षपणक कहलाता है । वह व्योम के समान नग्न दिगम्बर होता है । शक्ति सृष्टि का प्रसार प्रकाशित करती है, शिव उसका लय-संहार ( संकोच ) करता है, शक्ति और शिव में ऐक्य-भाव दृढ़ करने वाला सिद्ध योगिराज कहा जाता है अथवा शक्ति प्राणवायु है, श्वास-निःश्वास की प्रसारिका है और शिव ( आकर्षण करने वाला ) अपानवायु है, इन दोनों के मेलन-सामरस्य का कर्ता सिद्ध योगिराज कहलाता है ॥ ६२-६३ ॥ विश्वातीतं यथा विश्वमेकमेव विराजते । संयोगेन सदा यस्तु सिद्धयोगी भवेत्तु सः । ६४ । सर्वासां निजवृत्तीनां प्रसृतिर्भजते लयम् । स भवेत्सिद्धसिद्धान्ते सिद्धयोगो महाबलः । ६५ । उदासीनः सदा शान्त स्वस्योऽन्तर्निजभासकः । महानन्दमयो धीरः स भवेत् सिद्धयोगिराट् । ६६ । परिपूर्णः प्रसन्नात्मा सर्वासर्वपदोदितः । विशुद्धो निर्भरानन्दः स भवेत् सिद्धयोगिराट् । ६७ । १५८ ] [ _ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

गते न शोकं विभवे न वाञ्छा प्राप्ते न हर्षं स करोति योगी । आनन्दपूर्णो निजबोधलीनो न बाध्यते कालपथेन नित्यम् । ६८ । विश्वातीत ( संसार में व्यापक परब्रह्म ) परमेश्वर से जो निर्विकल्प समाधि में अभिन्न, तद्रूप अथवा तदाकार हो जाता है, वह योगी है। जो अपने मन की समस्त वृत्तियों को आत्मा में लय कर लेता है, वही सिद्धों के सिद्धान्त में परम शक्तिशाली महायोगी के रूप में सम्मानित होता है । जो विषयप्रपंच से रहित हो जाता है, सदा इस तरह उदासीन होकर शान्त रहता है, अपने स्वस्वरूप में स्थित रहकर उसका ( चैतन्यरूप में ) प्रकाशक होता है, जो सच्चिदानन्द में स्थित होकर नित्य कूटस्थ--असंग रहता है, वही सिद्धयोगिराज कहा जाता है । जो अखण्डचेतनस्वरूप होता है, सदा द्वन्द्वातीत होकर प्रसन्न रहता है, जो स्वाश्रित होता है अथवा समस्त प्रापंचिक उपाधियों से परे होकर नित्य अखण्ड स्वरूप में अधिष्ठित रहता है, जो निर्विकार और आनन्दस्वरूप होता है, वही सिद्ध योगिराज है । वह किसी पदार्थ अथवा धन आदि के नष्ट हो जाने पर शोक नहीं करता, सम्पत्ति आदि प्राप्त करने की उस (योगिराज) में वांछा नहीं होती, न प्राप्त होने पर उसे हर्ष होता है, अपने स्वसंवेद्यस्वरूप में वह परमानन्द में लीन रहता है, उसे मृत्यु से कोई बाधा नहीं रहती ॥ ६४-६८ ॥ सर्वसिद्धान्तदर्शनसमन्वयो एवं तु सर्वसिद्धान्तदर्शनानां पृथक् पृथग् भूतानामपि ब्रह्मणि समन्वयसूचनशीलोपदेशकत्र्ताऽवधूत एवं कर्ता सद्गुरुः प्रशस्यत एषामुपदेशानां पृथक् पृथक् सूचितानां जायते यत्र विश्रान्तिः सा विश्रान्तिर्विधीयते । ६९ । लीनतां च स्वयं याति निरुत्थानचमत्कृतेः । यतो निरुत्थानमयात् सोऽयं स्यादवधूतराट् । ७० । तस्मात्तं सद्गुरुं साक्षात् वन्दयेत् पूजयेत्सदा । सम्यक् सिद्धपदं धत्ते तत्क्षणात्स्वात्मभाषितम् । ७१ । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५६

न वन्दनीयास्ते काष्ठा दर्शनभ्रान्तिकारकाः । वर्जयेत्तान् गुरून् दूराद् धीरः सिद्धमताश्रयः । ७२ । इस तरह समस्त मतों का—सिद्धान्तों का परब्रह्म सच्चिदानन्द में समन्वय— सम्यक् तात्पर्य का बोध करानेवाला अवधूत सद्गुरु ही प्रशंसनीय है । समस्त दर्शनों के मत में समन्वय के द्वारा इन उपदेशों से वास्तविक विश्रान्ति की उपलब्धि होती है । विश्रान्तिरूप ( समन्वयात्मक ) निरुत्थान --निर्विकल्प समाधि से शोभित परब्रह्म परमेश्वर में योगी लीनता को प्राप्त करता है—ब्रह्मस्वरूप हो जाता है, वह इससे योगिराज हो जाता है, इसलिये ऐसे परब्रह्मस्वरूप योगी की ही वन्दना-पूजा करनी चाहिये । ऐसा करने पर योगसाधक अपने गुरु के ज्ञानोपदेश से तत्क्षण सिद्धपद प्राप्त कर लेता है । जो ब्रह्मदर्शन--स्वरूपबोध कराने में, सदुपदेश देने में असमर्थ हैं और शिष्यों को द्वैतप्रपंच में उलझाकर दिग्भ्रमित करते रहते हैं, उन अविवेकी ( बुद्धि से जड़ ) गुरुओं का सिद्धमत पर चलनेवाले साधकों द्वारा दूर ही से त्याग करना चाहिये, वे अज्ञान-अन्धकार में भरमाने वाले गुरु किसी भी स्थिति में वन्दनीय नहीं हैं ॥ ६६-७२ ॥ सिद्धमत का आश्रय वेदान्ती बहुतर्ककर्कशमतिर्ग्रस्तः परं मायया भाट्टाः कर्मकलाकुला हतधियो द्वैतेनवैशेषिकाः । अन्ये भेदरता विवादविकलाः सत्तत्वतो वञ्चिता- स्तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७३ । ( महायोगी गोरखनाथजी ने सिद्धमत--योगमार्ग की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है, सिद्धमत मार्ग की ही वरणीयता पर विशेष बल दिया है । ) वेदान्ती कर्मोपासना आदि का त्याग कर शब्दजाल—प्रमाण आदि का आश्रय ग्रहण कर द्वैतवाद का खण्डन करते हैं और अद्वैत का मण्डन करते हैं, उनकी मति कठोर तर्कों से ग्रसित रहती है और वह निदिध्यासन से वहिर्मुख हो जाती है । ( यद्यपि वे मायावाद का खण्डन कर जगत् को मिथ्या और ब्रह्म को सत्य कहते हैं तथापि माया में भ्रमित होकर अखण्ड ज्ञानस्वरूप आत्मतत्व से वंचित रहते हैं । ) पूर्वमीमांसक केवल यज्ञादि कर्म में तत्पर रहते हैं । वैशेषिक आदि दर्शनों के मर्मज्ञ द्वैताग्रह से सद्बुद्धि को कुण्ठित कर देते हैं, इसी तरह अन्य मत-मतान्तरों १६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

के अनुयायी अपने-अपने मत का दृढ़ समर्थन करने में विवाद प्रस्तुत करते हैं और सत्स्वरूप के बोध से वंचित रहते हैं, इसलिये श्रेष्ठ योग-मार्ग पर चलने वाले निष्ठावान् साधक को द्वैताद्वैतविवर्जित सत्सिद्धान्त—सिद्धमत का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये । समरसकरण–जीवात्मा-परमात्मा में निरुत्थान, विश्रान्ति- द्वारा ऐक्य-स्थापना, अभेदता ही सिद्धसिद्धान्त है ।। ७३ ।। सांख्या वैष्णववैदिकाविधिपराः संन्यासिनस्तापसाः सौरा वीरपराः प्रपञ्चनिरताः बौद्धाजिनश्रावकाः । एते कष्टरता वृथा पथगताः सत्तत्त्वतो वञ्चिता स्तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७४ । सांख्यदर्शन में निष्ठा रखने वाले सांख्यमतावलम्बी, वैष्णव, वैदिक, आचार- विचार में प्रवृत्ति रखने वाले, संन्यासाश्रमी, तपस्वी, सूर्यके उपासक, वीरशैव, सांसारिक विषय-प्रपञ्च में प्रवृत्त, बौद्ध और जैन आदि स्वसंवेद्य परमात्मस्वरूप से वञ्चित ( दूर ) होकर प्रपञ्च-जाल में ही उलझे रहते हैं, इसलिये योगसाधक को सिद्धसिद्धान्त का अनुगमन करना चाहिये ।। ७४ ।। आचार्या बहुदीक्षिता हुतिरता नग्नव्रतास्तापसा नानातीर्थनिषेवका जपपरा मौनेस्थिता नित्यशः । एते ते खलु दुःखभागनिरताः सत्तत्त्वतो वञ्चिता स्तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७५ । अनेक शिष्यों को मन्त्र-दीक्षा प्रदान करनेवाले गुरुजन–आचार्य यज्ञयागादि हवन-कर्म से मुक्ति का सम्पादन करनेवाले, दिगम्बर, तापस, अनेक तीर्थों में भ्रमण करनेवाले, जपकरनेवाले, मौनव्रत सदा धारण करनेवाले—सब-के-सब व्यर्थ दुःख के भार से आक्रान्त रहते हैं, उन्हें सत्स्वरूप की प्राप्ति नहीं हो पाती, इसलिये योगनिष्ठ साधक को समरसकरणभाव ( सिद्धसिद्धान्तमत के अनुरूप स्वरूपबोध की प्राप्ति के मार्ग ) का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये ।। ७५ ।। आदौ रेचकपूरकुम्भकविधौ नाड़ी यथाशोधितं कृत्वा हृत्कमलोदरे तु सहसा चित्तं महामूर्च्छितम् । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६१

पश्चादक्षरमव्ययं परकुले चोङ्कारदीपाङ्कुरे तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७६ । जिन्होंने सबसे पहले रेचक, पूरक और कुम्भक की विधि से प्राणायाम का अभ्यास कर नाड़ियों का अच्छी तरह शोधन ( शुद्धि ) किया, हृदय-कमल में मन को अच्छी तरह आत्मस्वरूपमें लीन कर ओङ्काररूपी दीप की ज्योति में अकार, उकार, मकार-अक्षर ( अव्यय-परम सिद्धदायक मन्त्र ) का जप कर परमात्म:में चित्त स्थिर कर सगुण-साकार ध्यान से क्रममुक्ति प्राप्त की, उन्हें भी स्वसंवेद्य परमपद का बिना सामरस्य के अनुभव नहीं हो सका, इसलिये योगसाधक को सिद्धसिद्धान्तसम्मत सामरस्य की प्राप्ति कर परमपद में स्थित होने के लिये उसी ( सिद्धसिद्धान्तसामरस्य ) का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ ७६ ॥ चार्वाकाश्चतुराश्च तर्कनिपुणा देहात्मवादे रताः ते सर्वे न तरन्ति दुःसहतरं ये ते परं सात्विकाः । ते सर्वे प्रभवन्ति ये च यवना पापे रता निर्दयाः तेषामैहिककल्पमेव हि फलं तत्त्वं न मोक्षं पदम् । ७७ । नीरस, व्यर्थ लौकिक तर्क में व्यामुग्ध और देह को ही आत्मा माननेवाले प्रत्यक्ष प्रमाणवादी चार्वाकमतानुयायी, परलोक के फल-भोग से वंचित रह कर अपारसंसार-सागर से पार नहीं हो पाते, जब सात्विक वृत्ति वाले नहीं पार हो पाते तो इन रजोगुणियों की सामर्थ्यं ही क्या है । इसी तरह तमोगुणीहिंसा आदि कर्म में तत्पर यवनादि भी क्षणिक विषयसुख का भोग कर लेते हैं, मोक्षपद की तो ( स्वप्न में भी ) ऐसे लोगों के लिये आशा ही नहीं है ॥ ७७ ॥ निरुत्थानरूप परमपद श्रीहट्टे मस्तकान्ते त्रिपुटपुटविले ब्रह्मरन्ध्रे ललाटे भ्रूनेत्रे नासिकाग्रे श्रवणपथरवे घण्टिकाराजदन्ते । कण्ठे हृन्नाभिमध्ये त्रिकमलकुहरे चोड्डियाने च पीठे एवं ये स्थानलग्नाः परमपदमहो नास्ति तेषां निरुत्थम् । ७८ । १६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

समस्त सरस्वती, लक्ष्मी, शक्ति आदि निधियों के केन्द्रस्थान ( श्रीहट्ट ) सहस्रार में त्रिकोणाकारयन्त्र के छिद्र ब्रह्मरन्ध्र में, ललाटमें, दोनों भौंहों के नेत्र में, नासिका के अग्रभाग में, श्रवणपथ में ( प्रवाहित ध्वनि—नाद के स्थान में ), घण्टिका के छिद्र-कण्ठकूप, कण्ठचक्र, हृदयचक्र, नाभिचक्र, त्रिकोणाकार कमल, उड्डियानपीठ में ध्यान करनेवाले भी परमपदरूप निरुत्थान— सामरस्यपूर्वक विश्रान्ति ( मोक्ष ) की प्राप्ति नहीं कर पाते हैं ॥ ७८ ॥ गोल्लाटे दीप्तिपुञ्जे प्रलयशिखिनिभे सिद्धजालन्धरे वा शृङ्गाटेज्योतिरेकं तडिदिवतरलं ब्रह्मनाड्यन्तराले । भालान्ते विद्युदाभे तदुपरि शिखरे कोटिमार्त्तण्डचण्डे ये नित्यं भावयन्ते परमपदमहो नास्ति तेषां निरुत्थम् ॥ ७९ ॥ दीप्ति ( प्रकाश ) से ज्योतित ( मस्तक के ही स्थान-विशेष ) गोल्लाट में, प्रलयकाल की अग्नि-शिखा के समान जालन्धर स्थान—शृङ्गाट में, ब्रह्मनाड़ी के भीतर, बिजली की आभा से युक्त मस्तक के अन्त ( मस्तकान्त ) में, उसके ऊपर करोड़ों सूर्य के समान प्रभायुक्त शिखरप्रदेश में जो बिजली के समान तरल ज्योति के ध्यान में तत्पर होते हैं, उनके लिये भी परमपदरूप निरुत्थान ( मोक्षपद ) दुर्लभ है ॥ ७९ ॥ लिङ्गाद् दण्डाङ्कुरान्तर्मनपवनगमाद् ब्रह्मनाड्यादिभेदं कृत्वा विन्दुं नयन्तः परमपदगुहां शङ्खगर्भोदरोर्ध्वम् । तत्रान्तर्नादघोषं गगनगुणमयं वज्रदण्डोक्रमेण ये कुर्वन्तीहकष्टान् परमपदमहो नास्ति तेषां निरुत्थम् ॥ ८० ॥ लिङ्ग से मेरुदण्ड में मन और प्राणवायु ( पवन ) के प्रवेश से सुषुम्नानाड़ी का भेदन कर वीर्य को भ्रमरगुफामें शंखविवर के ऊपरी भाग में ऊर्ध्वमुख कर अथवा प्रविष्ट कर वज्रोली क्रिया के द्वारा उसे ( वीर्य को ) स्थापित कर व्यापक नाद प्रस्फुटित करनेवालों के लिये परमपदरूप निरुत्थान ( मोक्षपद ) दुर्लभ है ॥ ८० ॥ सम्यक् चालनदोहनेन सततं दीर्घीकृतां लम्बिकां तां ताल्वन्तखेशितां च दशमद्वारोदरे सन्धिनीम् । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६३

नीत्वा मध्यमसन्धिसंघटघटात् प्राप्तां शिरोदेशतः पीत्वा षड्विधपानकाष्ठभजनं वाञ्छन्ति ये मोहिताः । ८१ । ( महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि खेचरी मुद्रा की भी सिद्धि क्यों न हो जाय, पर निरुत्थान के बिना यह भी निष्फल है । ) जो अच्छी तरह चालन- दोहन-क्रिया के द्वारा जीभ को दीर्घ कर तालु के अन्त में दशम द्वार—भ्रूमध्य में ले जाकर ( ! उसमें उसे—जिह्वा को संयुक्त कर ) सहस्रार से द्रवित अमृत का षड्रसरूप पान करते हैं और खेचरी मुद्रा की सिद्धि कर लेते हैं, वे भी यदि निरुत्थान--परमपद की प्राप्ति की इच्छा करते हैं, तो भ्रमित हैं । उन्हें भी निरुत्थान नहीं प्राप्त हो सकता ।। ८१ ।। गुह्यात्पश्चिमपूर्वमार्गमुभयं रुध्वानिलं मध्यमं नीत्वा ध्यानसमाधिलक्ष्यकरणैर्नानासमाध्यासनैः । प्राणापानगमागमेन सततं हंसोदरे संघटा एवं येऽपि भजन्ति ते भवजले मज्जन्त्यहो दुःखिताः । ८२ । गुदास्थान—मूलाधार से पश्चिम-पूर्व-पथ में इडा और पिंगला नाड़ियों में प्रवाहित प्राण को रोक कर सुषुम्ना में प्रविष्ट प्राणवायु को ऊर्ध्व कर ध्यान- समाधि आदि विभिन्न साधनों से प्राण-अपान के गमनागमन पर दृष्टि स्थिर कर जो नाड़ी-समूहों में ही ध्यान में तत्पर रहते हैं, वे भी समरसकरण के बिना निरुत्थानरूप परमपद की प्राप्ति न करने से दुःखी रहते हैं, संसारसागर में डूबते रहते हैं ।। ८२ ।। शक्त्याकुञ्चनमग्निदोप्तिकरणं त्वाधारसंपीडनात् स्थामात्कुण्डलिनीप्रबोधनमतः कृत्वा ततो मूर्धनि । नोत्वा पूर्णगिरिं निपातनमधः कुर्वन्ति तस्याश्च ये खण्डज्ञानरतास्तु ते निजपदं तेषां हि दूरं मतम् । ८३ । जो शक्तिचालनी मुद्रा के अभ्यास द्वारा एड़ी से मूलाधार को दबाकर मूलबन्ध सिद्धकर अग्नि प्रदीप्त कर ( तथा अपानवायु का ऊर्ध्वाकर्षण कर ) कुण्डलिनी को प्रबुद्ध कर पूर्णगिरि पीठ में ले जाकर शिवशक्ति के साक्षात्कार में आनन्दित होते हैं और तत्पश्चात् कुण्डलिनी को ( ध्यान हटाते समय ) मूलाधार में ही उतार लाते हैं, वे ऐसा करके खण्डज्ञान—अपूर्ण आत्मबोध ही प्राप्त करते हैं, १६४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

उनके लिये भी अखण्ड ज्ञानस्वरूप निरुत्थान-पद की प्राप्ति कठिन है, क्योंकि वे परमात्मध्यान की अवस्था में रह कर फिर प्रपञ्च-लोकव्यवहार में उतर आते हैं ।। ८३ ।। बन्धं भेदञ्च मुद्रां गलबिलचिबुकाबद्धमार्गेषु वह्नि चन्द्रार्कासामरस्यं शमदमनियमानादबिन्दुं कलान्ते । ये नित्यं मेलयन्ते ह्यनुभवमनसाप्युन्मनीयोगयुक्तास्ते लोकान्भ्रामयन्ते निजसुखविमुखाः कर्मदुःखाध्वभाजः । ८४ । मूलबन्धादि, षट्चक्रभेदन और मुद्रा के अभ्यास से ठोड़ी को वक्षःस्थल से जालन्धरबन्धपूर्वक संयत कर कण्ठ-छिद्र के प्रतिरोध से समस्त नाड़ीमार्गों के रुक जानेपर प्रज्वलित अग्नि तथा चन्द्र और सूर्य ( इडा-पिंगला में प्रवाहित अपान और प्राण ) के सुषुम्णा में मेल से शमदमादिनियमोंके पालन और नादबिन्दु कलाओं के अन्तस्वरूप सहस्रार में शिव-शक्ति के ऐक्यपूर्वक उन्मनी अवस्था की सिद्धि करने पर भी जो योगी निजस्वरूप - परमपदरूप निरुत्थान के सुख से विमुख होकर ज्ञानोपदेश द्वारा लोगों को भ्रमित करते हैं, वे स्वरूपबोध न होने से नितान्त दुःखी रहते हैं ।। ८४ ।। अष्टाङ्ग योगमार्गं कुलपुरुषमतं षण्मुखीचक्रभेदं ऊर्ध्वाश्रो वायुमध्ये रविकिरणनिभं सर्वतोव्याप्तिसारम् । दृष्ट्या ये वीक्ष्यन्ते तरलजलसमं नीलवर्णं नभो वा एवं ये भावयन्ते निगदितमतयस्तेऽपि हा कष्टभाजः । ८५ । जो यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिरूप अष्टांगयोग का अभ्यास कर आचार्य-गुरुके द्वारा विधिपूर्वक उपदिष्ट मूलाधारचक्र, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्र का भेदन कर प्राण-अपान वायु को सुषुम्ना मार्ग से उर्ध्वमुख करते हुए सूर्य की प्रभा के समान अखण्ड ज्योति को सम्पूर्ण रूप से नासाग्रदृष्टि स्थिर कर ध्यान में देखते हैं तथा नीले रंग वाले आकाश का ध्यान करते हैं, ऐसे प्रसिद्ध योगसाधक भी निरुत्थानरूप परमपद की प्राप्ति से वञ्चित रहकर दुःखी होते हैं ।। ८५ ।। आदौ धारणशङ्खधारणमतः कृत्वा महाधारणाम् सम्पूर्णं प्रतिधारणं विधिबलाद् दृष्टिस्तथा निर्मला । सिद्धसिद्धान्तपद्धति [ १६५

अधौली बहुलीहवासनमथो घण्टावसन्नौलिका ये कुर्वन्ति च कारयन्ति च सदा भ्राम्यन्ति खिद्यन्ति ते । ८६ । योगशास्त्र में निरूपित तथा आचार्यद्वारा निर्दिष्ट ज्ञान के बल से जो पहले पृथ्‍वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की पाँच धारणाओं में आकाशधारणा, पराकाशधारणा और महाकाश-धारणा तथा तत्वाकाश ( सम्पूर्ण पाँच तत्वों की ) धारणा पूरी कर ध्येय ( आत्मस्वरूप परम लक्ष्य ) में दृष्टि स्थिर करते हैं तथा षट्कर्म—अधौली ( धौति ), वासन ( वस्ति ) नेति, नौलि, कपालभाति तथा त्राटक आदि करते और दूसरों से भी इनका अभ्यास कराते हैं, वे भी सत्स्वरूप निरुत्थान की प्राप्ति से वंचित रह कर भ्रमित और खिन्न रहते हैं ।। ८६ ।। शङ्खक्षालनमन्तरं रसनया ताल्वोष्ठनासारसं वान्तेरुल्लुठनं कपाटममरीपानं तथा खर्परी । वीर्यद्रावितमात्मजं पुनरहो ग्रासं प्रलेपश्च वा ये कुर्वन्ति जडास्तु ते नहि फलं तेषां तु सिद्धान्तजम् । ८७ । शंखनाड़ी का शोधन कर रसना से तालु, ओष्ठ और नासारस को निकाल कर इस तरह भीतर के समस्त चक्रों का शोधन करने के उपरान्त, कपाट मुद्रा- भेदन के अभ्यास में तत्पर होकर खर्पर धारण कर अमरीपान करनेवाले तथा उसका शरीर में लेप कर स्फूर्ति प्राप्त करनेवाले जड़बुद्धि भी इस तरह स्थित रहकर सामरस्यरूप परमात्मपद की प्राप्ति से वंचित रहते हैं ।। ८७ ।। घण्टाकोहलकालमार्दुलमहाभेरीनिनादं यदा सम्यङ्नादमनाहतध्वनिमयं शृण्वन्ति चैतादृशम् । पिण्ड सर्वगतं निरन्तरतया ब्रह्माण्डमध्येऽपि वा तेषां सिद्धपदं ततः समुचितं नैवं परं लभ्यते । ८८ । जो प्राणायाम की सिद्धि कर प्राण, बिन्दु और मन को ऊर्ध्वगामी कर शिवशक्ति के साक्षात्कार के लिये उनका पारस्परिक लय सम्पादित कर व्यष्टि पिण्ड और ब्रह्माण्ड में निरन्तर घण्टा, कोहल, कांस्य, ढोल, महाभेरी के अनाहत १६६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

ध्वनिमय सरस, मृदुल निनादित नाद का श्रवण करते हैं, वे भी अखण्ड ज्योतिः- स्वरूप परमात्म पद की प्राप्ति करने में असमर्थ होते हैं ।। ८७ ।। वैराग्यात् तृणशाकपल्वलजलं कन्दं फलं मूलकं भुक्त्वा यो वनवासमेवभजते चान्ये च देशान्तरे । बालोन्मत्तपिशाचमूकजडवच्चेष्टाश्च नानाविधाः ये कुर्वन्ति पदं विना मतिबलं भ्रष्टा विमुह्यन्ति ते । ८६ । जो वैराग्य ग्रहण करने पर पत्ती के शाक, तृण, पल्वलजल ( जलाशय ) के तथा कन्दमूल, फल का सेवन करते हैं, एकान्त में निवास करते हैं और अनेक देश-देशान्तर में भ्रमण कर बालवत्, उन्मत्त, पिशाच, मूक, जड़वत् होकर अपनी अनेक चेष्टाओं से लोगों को आश्चर्यचकित करते हैं, वे भी बिना आत्मज्ञान का बल प्राप्त किये इस संसार में मोहित होते रहते हैं ।। ८६ ।। कन्थादर्शनमद्भुतं बहुविधं भिक्षाटनं नाटकं भस्मोद्धूलनमङ्गकर्कशतरं धृत्वा च वर्षं त्वरेत् । क्षेत्रं क्षेत्रमटन्ति दुर्गमतरे स्थित्वाऽथ सर्वेन्द्रियं नो विन्दन्ति परं पदं गुरुमुखाद् गर्वेण कष्टाश्च ते । ६० । विचित्र ( रंगविरंगी ) गुदड़ी धारण कर भिक्षा माँगते हुए तथा विभूति आदि से शरीर को उद्धूलित कर उसे कर्कश-शीत, धूप, वर्षा के आघातों को सहने योग्य सिद्ध कर जो कितने ही वर्ष बिता देते हैं और इन्द्रियों को वश में कर दुर्गम तीर्थक्षेत्रों और तपःस्थलियों में निवास करते हुए गुरु के शरणागत होकर भी उनसे सद्ज्ञानोपदेश नहीं प्राप्त करते, अहंकारवश वे परमपद से वंचित होकर कष्ट पाते हैं ।। ६० ।। वाणीं ये च चतुर्विधां स्वरचितां सिद्धैश्च वा निर्मितां गायत्रींचतुराश्च पाठनिरता विद्याविवादे रताः नो विन्दन्ति तदर्थमात्मसदृशं खिद्यन्ति मोहाच्छलात् दण्डैः कर्तरिशूलचक्रलगुडैर्भाण्डाश्च दुष्टाश्च ते । ६१ । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६७

जो परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी वाणी में अनुभूतियुक्त हैं, अथवा सिद्ध पुरुषों द्वारा अथवा अपने ही द्वारा रचित स्तोत्र, सिद्धान्त आदि में पारंगत हैं, गायत्री मन्त्र के जप में तत्पर हैं, स्तोत्रादि का पाठ करते रहते हैं, शास्त्रार्थ में तत्पर रहते हैं, वे भी यथार्थ अखण्ड आत्मज्ञान--व्यष्टिपिण्ड और ब्रह्माण्ड में व्याप्त परमात्म स्वरूप को न जानकर खेद करते हैं तथा हाथ में दण्ड, कुल्हाड़ी, त्रिशूल, चक्र और लाठी आदि धारण करते हैं और मिथ्या स्वाँग बना कर विदूषक का आचरण करते हैं, वे भांड़ और दुष्ट हैं, क्योंकि यथार्थ अखण्ड स्वरूप में उनका प्रवेश नहीं हो पाता है ॥ ६१ ॥ एवं शून्यादिशून्यं परमपरपदं पञ्चशून्यादिशून्यं व्योमातीतं ह्यनाद्यं निजकुलमकुलं चाद्भुतं विश्वरूपम् । अव्यक्तं चान्तरालं निरुदयमपरं भासनिर्नाममैक्यं वाङ्मात्राद् भासयन्तोबहुविधमनसोव्याकुलाभ्रामितास्ते । ६२। ( महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि शून्यवादी केवल वाणी मात्र से शून्यवाद का प्रतिपादन कर और दूसरों के प्रति उसका कथन कर यथार्थ आत्म- तत्व का स्पर्श तक नहीं कर सकते हैं । ) शून्यादि शून्य परमपर पद पञ्च- शून्यादिशून्य है ( पाँच भूतों में पृथ्वी और जल में शून्य है, जल और तेज के मध्य में शून्य है, तेज और वायु के मध्य में शून्य है, वायु और आकाश के मध्य में शून्य है और आकाश शून्यरूप है ), व्योमातीत, अनादि, अकुल, कुल, अद्भुत, विश्वरूप, अव्यक्त, अन्तर्व्याप्त, ( सब में व्याप्त ), सूक्ष्म, उत्पत्तिरहित, नामरूप से रहित है--इस तरह वे केवल कथन करते रहते हैं और दूसरों को शून्यवाद का उपदेश देते हैं, ऐसे लोग मन में व्याकुल और भ्रमित रहते हैं, क्योंकि वे परमपद से वञ्चित रहते हैं ॥ ६२ ॥ आज्ञासिद्धिकरं सदा समुचितं सम्पूर्णभाभासकं पिण्डे सर्वगतं विधानममलं सिद्धान्तसारं वरम् । भ्रान्तेर्निर्हरणं सुखातिसुखदं कालान्तकं शाश्वतं तन्नित्यं कलनोज्झितं गुरुमयं ज्ञेय निरुत्थं पदम् । ६३। १६८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

निरुत्थानरूप अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविवर्जित स्वसंवेद्य परमपद ही ज्ञेय है। यह पद अन्योपदेश-निरपेक्ष अखण्डस्वरूप है, स्वानुभवैकगम्य है, अच्युत है, ध्रुव है, समस्त प्रकाशों--सूर्य, चन्द्र आदि का प्रकाशक है, व्यष्टि-पिण्ड और ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापक है, रागद्वेषरहित, निर्विकार, सत्सिद्धान्तस्वरूप है, संसाररूप भ्रम का निवारक है, नित्यस्वरूप मोक्षानन्द प्रदान करनेवाला है, नित्य—अकाल, महाकालरूप परमेश्वर है, शाश्वत है, सनातन है, संकल्पातीत है, परमात्मस्वरूप गुरु द्वारा ज्ञेय है--गुरुज्ञानस्वरूप है। यह परमपद ही परमाश्रय है ॥ ६३ ॥ आदेश का स्वरूप आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति विचारणे । त्रयाणामैक्यसंभूतिरादेश इति कीर्तितः । ६४ । आदेश इति सद्वाणीं सर्वद्वन्द्वक्षयापहाम् । यो योगिनं प्रति वदेत् स यात्यात्मानमैश्वरम् । ६५ । ( जिसके प्रति 'आदेश' शब्द व्यवहृत होता है, उसकी 'आदेश' के उच्चारण द्वारा ब्रह्मस्वरूपता का प्रतिपादन होता है ।) आत्मा, परमात्मा, और जीवात्मा के सम्बन्ध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि तीनों की एकता की सम्भूति-- उत्पत्ति ( अभिन्न सत्ता ) ही 'आदेश' के रूप में प्रसिद्ध है। 'आदेश' परमात्म स्वरूप का प्रतिपादन करने वाली सद्वाणी है, इसके उच्चारण मात्र से जरा- मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि समस्त प्रपंचात्मक द्वन्द्वों का क्षय--नाश हो जाता है। जो प्राणी योगी के प्रति 'आदेश, आदेश' शब्द का व्यवहार करता है, वह परमात्मा और आत्मा के अभिन्न स्वरूप को तत्वतः जान लेता है ॥ ६४-६५ ॥ विशेष—अपने प्रापंचिक विचार में हम आत्मा, परमात्मा और जीवात्मा में भेद करते हैं। तीनों की एकता ही सत्य है और इस सत्य का अनुभव या दर्शन ही आदेश कहलाता है। 'आदेश' के उच्चारणपूर्वक अभिवादन से योगी निरन्तर एक-दूसरे को जीवात्मा और परमात्मा के तादात्म्य का स्मरण कराते हैं। 'आदेश' का क्या उपदेश है, इस सम्बन्ध में महायोगी गोरखनाथ ने अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के चरण में जिज्ञासा की तो गुरु ने कहा-- सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६६

'अवधू आदेस का अनूषम उपदेस' ( मच्छींद्र-गोरष-बोध-६ ) इसका तात्पर्य यह है कि आदेश सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मपद का प्रतिपादक परम उपदेश है । 'गोरखबानी' में 'रहरासि' नामक अत्यन्त लघु रचना में गोरखनाथजी का कथन है : 'ॐ आदेस आदेस अलष अतीतं' केन उपनिषद् में आदेश को परमात्मतत्व का सांकेतिक उपदेश स्वीकार किया गया है : 'तस्यैष आदेशो यदेतद्' ( केन उ० ४ । ४ ) श्रीगोरखनाथजी ने जोधपुराधीश महाराज मानसिंह को आदेश का स्वप्न में तत्त्वोपदेश दिया था-- नाथार्थोऽस्तु तवादेशो विदेशश्चास्तु वैरिणाम् । प्रदेशश्चास्तु भक्तानामुपदेशस्तु मे सदा ॥ नृसिंहोत्तरतापिनी-उपनिषद् में भी आदेश के सांकेतिक तत्वस्वरूप शान्त, अद्वैत शिवस्वरूप का प्रतिपादन हुआ है । 'अथ तस्यायमादेशी मात्रश्चतुर्थो व्यवहार्य प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वै त ॐकार आत्मैवसंविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ।' [ नृसिंहोत्तरतापिनी खण्ड २ ] आशादहनं भसितं कुण्डलयुगलं विचारसन्तोषः । कौपीनं स्थिरचित्तं खर्परमाकाशमात्मनो भजनम् । ६६। जिस योगी ने आशा-तृष्णा को जलाकर भस्मरूप कर दिया है, उसके अंग में तृष्णादहनरूप भस्म ही विभूति-धारण है, उसके कान के दोनों कुण्डलरूप में आत्मविचार और संतोष ही विशोभित हैं, स्थिरचित्त होना ही उसके द्वारा १७० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

कौपीन धारण है, हृदयाकाश में स्वरूप-चिन्तन ही उसके द्वारा हाथ में खर्पर का धारण है, आत्मा में अवस्थान—स्वरूपावस्थान ही उसके लिये भजन है, परमपद का वेध है। सिद्धसिद्धान्तरूप योगशास्त्र एतच्छास्त्रं महादिव्यं रहस्यं पारमेश्वरम् । सिद्धान्तं सर्वसारस्य नानासङ्केतनिर्णयम् । ९७ । सिद्धानां प्रकटं सिद्धं सद्यः प्रत्ययकारकम् । आत्मानन्दकरं नित्यं सर्वसन्देहनाशनम् । ६८ । न देयं परशिष्येभ्यो नान्येषां सन्निधौ पठेत् । न स्नेहान्नबलाल्लोभान्नमोहान्नाताच्छलात् । ६६ । न मैत्रो भावनाद्दानान्नसौन्दर्यान्न चासनात् । पुत्रस्यापि न दातव्यं गुरुशिष्यक्रमं विना । १०० । सिद्धसिद्धान्तरूप यह सत्योगशास्त्र महादिव्य है, अपने-आप में निगूढ़ रहस्य है, परमेश्वरस्वरूप है, समस्त तत्त्वों का एकमात्र सुनिश्चित सिद्धान्त है और अनेक तत्सम्बन्धी संकेतों का निश्चयात्मक निर्णय है, सिद्धों द्वारा प्रत्यक्ष किया गया महायोग ज्ञान है, स्वसंवेद्य पद — स्वरूपावस्थान में प्रतिष्ठित करनेवाला है, स्वरूपानन्द प्रदान करता है, यह नित्य, सनातन ज्ञान है, समस्त सन्देहों—तत्त्व के विषय में शंकाओं का उच्छेद करनेवाला है । इस योगशास्त्र का उपदेश उनको नहीं देना चाहिये, जो अन्य मार्गी हैं, इसका ऐसे लोगों के समक्ष पाठ तक नहीं करना चाहिये, जो दूसरे मत-मतान्तरों में भ्रमित हैं । किसी के प्रति अपार स्नेह हो, उसे भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । कोई बलपूर्वक अथवा लोभ दिखा कर अथवा मुग्ध कर अथवा छल प्रकट कर भी इसको ग्रहण करना चाहे, उसके लिये भी यह निषिद्ध है । मैत्री-भावना के वश होकर, किसी के रूप-सौन्दर्य या सत्कार से भी आकृष्ट होकर इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । अपने प्रिय पुत्र तक को भी इस योगज्ञान का उपदेश नहीं देना चाहिये, जब तक वह सिद्धमत की विधि से गुरुमन्त्र ग्रहण कर उपदेश प्राप्त करने का पात्र नहीं बन जाता है ॥ ६७—१०० ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७१