सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके अनुयायी अपने-अपने मत का दृढ़ समर्थन करने में विवाद प्रस्तुत करते हैं और सत्स्वरूप के बोध से वंचित रहते हैं, इसलिये श्रेष्ठ योग-मार्ग पर चलने वाले निष्ठावान् साधक को द्वैताद्वैतविवर्जित सत्सिद्धान्त—सिद्धमत का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये । समरसकरण–जीवात्मा-परमात्मा में निरुत्थान, विश्रान्ति- द्वारा ऐक्य-स्थापना, अभेदता ही सिद्धसिद्धान्त है ।। ७३ ।। सांख्या वैष्णववैदिकाविधिपराः संन्यासिनस्तापसाः सौरा वीरपराः प्रपञ्चनिरताः बौद्धाजिनश्रावकाः । एते कष्टरता वृथा पथगताः सत्तत्त्वतो वञ्चिता स्तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७४ । सांख्यदर्शन में निष्ठा रखने वाले सांख्यमतावलम्बी, वैष्णव, वैदिक, आचार- विचार में प्रवृत्ति रखने वाले, संन्यासाश्रमी, तपस्वी, सूर्यके उपासक, वीरशैव, सांसारिक विषय-प्रपञ्च में प्रवृत्त, बौद्ध और जैन आदि स्वसंवेद्य परमात्मस्वरूप से वञ्चित ( दूर ) होकर प्रपञ्च-जाल में ही उलझे रहते हैं, इसलिये योगसाधक को सिद्धसिद्धान्त का अनुगमन करना चाहिये ।। ७४ ।। आचार्या बहुदीक्षिता हुतिरता नग्नव्रतास्तापसा नानातीर्थनिषेवका जपपरा मौनेस्थिता नित्यशः । एते ते खलु दुःखभागनिरताः सत्तत्त्वतो वञ्चिता स्तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७५ । अनेक शिष्यों को मन्त्र-दीक्षा प्रदान करनेवाले गुरुजन–आचार्य यज्ञयागादि हवन-कर्म से मुक्ति का सम्पादन करनेवाले, दिगम्बर, तापस, अनेक तीर्थों में भ्रमण करनेवाले, जपकरनेवाले, मौनव्रत सदा धारण करनेवाले—सब-के-सब व्यर्थ दुःख के भार से आक्रान्त रहते हैं, उन्हें सत्स्वरूप की प्राप्ति नहीं हो पाती, इसलिये योगनिष्ठ साधक को समरसकरणभाव ( सिद्धसिद्धान्तमत के अनुरूप स्वरूपबोध की प्राप्ति के मार्ग ) का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये ।। ७५ ।। आदौ रेचकपूरकुम्भकविधौ नाड़ी यथाशोधितं कृत्वा हृत्कमलोदरे तु सहसा चित्तं महामूर्च्छितम् । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६१