भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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पश्चादक्षरमव्ययं परकुले चोङ्कारदीपाङ्कुरे तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७६ । जिन्होंने सबसे पहले रेचक, पूरक और कुम्भक की विधि से प्राणायाम का अभ्यास कर नाड़ियों का अच्छी तरह शोधन ( शुद्धि ) किया, हृदय-कमल में मन को अच्छी तरह आत्मस्वरूपमें लीन कर ओङ्काररूपी दीप की ज्योति में अकार, उकार, मकार-अक्षर ( अव्यय-परम सिद्धदायक मन्त्र ) का जप कर परमात्म:में चित्त स्थिर कर सगुण-साकार ध्यान से क्रममुक्ति प्राप्त की, उन्हें भी स्वसंवेद्य परमपद का बिना सामरस्य के अनुभव नहीं हो सका, इसलिये योगसाधक को सिद्धसिद्धान्तसम्मत सामरस्य की प्राप्ति कर परमपद में स्थित होने के लिये उसी ( सिद्धसिद्धान्तसामरस्य ) का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ ७६ ॥ चार्वाकाश्चतुराश्च तर्कनिपुणा देहात्मवादे रताः ते सर्वे न तरन्ति दुःसहतरं ये ते परं सात्विकाः । ते सर्वे प्रभवन्ति ये च यवना पापे रता निर्दयाः तेषामैहिककल्पमेव हि फलं तत्त्वं न मोक्षं पदम् । ७७ । नीरस, व्यर्थ लौकिक तर्क में व्यामुग्ध और देह को ही आत्मा माननेवाले प्रत्यक्ष प्रमाणवादी चार्वाकमतानुयायी, परलोक के फल-भोग से वंचित रह कर अपारसंसार-सागर से पार नहीं हो पाते, जब सात्विक वृत्ति वाले नहीं पार हो पाते तो इन रजोगुणियों की सामर्थ्यं ही क्या है । इसी तरह तमोगुणीहिंसा आदि कर्म में तत्पर यवनादि भी क्षणिक विषयसुख का भोग कर लेते हैं, मोक्षपद की तो ( स्वप्न में भी ) ऐसे लोगों के लिये आशा ही नहीं है ॥ ७७ ॥ निरुत्थानरूप परमपद श्रीहट्टे मस्तकान्ते त्रिपुटपुटविले ब्रह्मरन्ध्रे ललाटे भ्रूनेत्रे नासिकाग्रे श्रवणपथरवे घण्टिकाराजदन्ते । कण्ठे हृन्नाभिमध्ये त्रिकमलकुहरे चोड्डियाने च पीठे एवं ये स्थानलग्नाः परमपदमहो नास्ति तेषां निरुत्थम् । ७८ । १६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति