भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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समस्त सरस्वती, लक्ष्मी, शक्ति आदि निधियों के केन्द्रस्थान ( श्रीहट्ट ) सहस्रार में त्रिकोणाकारयन्त्र के छिद्र ब्रह्मरन्ध्र में, ललाटमें, दोनों भौंहों के नेत्र में, नासिका के अग्रभाग में, श्रवणपथ में ( प्रवाहित ध्वनि—नाद के स्थान में ), घण्टिका के छिद्र-कण्ठकूप, कण्ठचक्र, हृदयचक्र, नाभिचक्र, त्रिकोणाकार कमल, उड्डियानपीठ में ध्यान करनेवाले भी परमपदरूप निरुत्थान— सामरस्यपूर्वक विश्रान्ति ( मोक्ष ) की प्राप्ति नहीं कर पाते हैं ॥ ७८ ॥ गोल्लाटे दीप्तिपुञ्जे प्रलयशिखिनिभे सिद्धजालन्धरे वा शृङ्गाटेज्योतिरेकं तडिदिवतरलं ब्रह्मनाड्यन्तराले । भालान्ते विद्युदाभे तदुपरि शिखरे कोटिमार्त्तण्डचण्डे ये नित्यं भावयन्ते परमपदमहो नास्ति तेषां निरुत्थम् ॥ ७९ ॥ दीप्ति ( प्रकाश ) से ज्योतित ( मस्तक के ही स्थान-विशेष ) गोल्लाट में, प्रलयकाल की अग्नि-शिखा के समान जालन्धर स्थान—शृङ्गाट में, ब्रह्मनाड़ी के भीतर, बिजली की आभा से युक्त मस्तक के अन्त ( मस्तकान्त ) में, उसके ऊपर करोड़ों सूर्य के समान प्रभायुक्त शिखरप्रदेश में जो बिजली के समान तरल ज्योति के ध्यान में तत्पर होते हैं, उनके लिये भी परमपदरूप निरुत्थान ( मोक्षपद ) दुर्लभ है ॥ ७९ ॥ लिङ्गाद् दण्डाङ्कुरान्तर्मनपवनगमाद् ब्रह्मनाड्यादिभेदं कृत्वा विन्दुं नयन्तः परमपदगुहां शङ्खगर्भोदरोर्ध्वम् । तत्रान्तर्नादघोषं गगनगुणमयं वज्रदण्डोक्रमेण ये कुर्वन्तीहकष्टान् परमपदमहो नास्ति तेषां निरुत्थम् ॥ ८० ॥ लिङ्ग से मेरुदण्ड में मन और प्राणवायु ( पवन ) के प्रवेश से सुषुम्नानाड़ी का भेदन कर वीर्य को भ्रमरगुफामें शंखविवर के ऊपरी भाग में ऊर्ध्वमुख कर अथवा प्रविष्ट कर वज्रोली क्रिया के द्वारा उसे ( वीर्य को ) स्थापित कर व्यापक नाद प्रस्फुटित करनेवालों के लिये परमपदरूप निरुत्थान ( मोक्षपद ) दुर्लभ है ॥ ८० ॥ सम्यक् चालनदोहनेन सततं दीर्घीकृतां लम्बिकां तां ताल्वन्तखेशितां च दशमद्वारोदरे सन्धिनीम् । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६३