भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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'अवधू आदेस का अनूषम उपदेस' ( मच्छींद्र-गोरष-बोध-६ ) इसका तात्पर्य यह है कि आदेश सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मपद का प्रतिपादक परम उपदेश है । 'गोरखबानी' में 'रहरासि' नामक अत्यन्त लघु रचना में गोरखनाथजी का कथन है : 'ॐ आदेस आदेस अलष अतीतं' केन उपनिषद् में आदेश को परमात्मतत्व का सांकेतिक उपदेश स्वीकार किया गया है : 'तस्यैष आदेशो यदेतद्' ( केन उ० ४ । ४ ) श्रीगोरखनाथजी ने जोधपुराधीश महाराज मानसिंह को आदेश का स्वप्न में तत्त्वोपदेश दिया था-- नाथार्थोऽस्तु तवादेशो विदेशश्चास्तु वैरिणाम् । प्रदेशश्चास्तु भक्तानामुपदेशस्तु मे सदा ॥ नृसिंहोत्तरतापिनी-उपनिषद् में भी आदेश के सांकेतिक तत्वस्वरूप शान्त, अद्वैत शिवस्वरूप का प्रतिपादन हुआ है । 'अथ तस्यायमादेशी मात्रश्चतुर्थो व्यवहार्य प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वै त ॐकार आत्मैवसंविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ।' [ नृसिंहोत्तरतापिनी खण्ड २ ] आशादहनं भसितं कुण्डलयुगलं विचारसन्तोषः । कौपीनं स्थिरचित्तं खर्परमाकाशमात्मनो भजनम् । ६६। जिस योगी ने आशा-तृष्णा को जलाकर भस्मरूप कर दिया है, उसके अंग में तृष्णादहनरूप भस्म ही विभूति-धारण है, उसके कान के दोनों कुण्डलरूप में आत्मविचार और संतोष ही विशोभित हैं, स्थिरचित्त होना ही उसके द्वारा १७० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति