सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिरुत्थानरूप अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविवर्जित स्वसंवेद्य परमपद ही ज्ञेय है। यह पद अन्योपदेश-निरपेक्ष अखण्डस्वरूप है, स्वानुभवैकगम्य है, अच्युत है, ध्रुव है, समस्त प्रकाशों--सूर्य, चन्द्र आदि का प्रकाशक है, व्यष्टि-पिण्ड और ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापक है, रागद्वेषरहित, निर्विकार, सत्सिद्धान्तस्वरूप है, संसाररूप भ्रम का निवारक है, नित्यस्वरूप मोक्षानन्द प्रदान करनेवाला है, नित्य—अकाल, महाकालरूप परमेश्वर है, शाश्वत है, सनातन है, संकल्पातीत है, परमात्मस्वरूप गुरु द्वारा ज्ञेय है--गुरुज्ञानस्वरूप है। यह परमपद ही परमाश्रय है ॥ ६३ ॥ आदेश का स्वरूप आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति विचारणे । त्रयाणामैक्यसंभूतिरादेश इति कीर्तितः । ६४ । आदेश इति सद्वाणीं सर्वद्वन्द्वक्षयापहाम् । यो योगिनं प्रति वदेत् स यात्यात्मानमैश्वरम् । ६५ । ( जिसके प्रति 'आदेश' शब्द व्यवहृत होता है, उसकी 'आदेश' के उच्चारण द्वारा ब्रह्मस्वरूपता का प्रतिपादन होता है ।) आत्मा, परमात्मा, और जीवात्मा के सम्बन्ध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि तीनों की एकता की सम्भूति-- उत्पत्ति ( अभिन्न सत्ता ) ही 'आदेश' के रूप में प्रसिद्ध है। 'आदेश' परमात्म स्वरूप का प्रतिपादन करने वाली सद्वाणी है, इसके उच्चारण मात्र से जरा- मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि समस्त प्रपंचात्मक द्वन्द्वों का क्षय--नाश हो जाता है। जो प्राणी योगी के प्रति 'आदेश, आदेश' शब्द का व्यवहार करता है, वह परमात्मा और आत्मा के अभिन्न स्वरूप को तत्वतः जान लेता है ॥ ६४-६५ ॥ विशेष—अपने प्रापंचिक विचार में हम आत्मा, परमात्मा और जीवात्मा में भेद करते हैं। तीनों की एकता ही सत्य है और इस सत्य का अनुभव या दर्शन ही आदेश कहलाता है। 'आदेश' के उच्चारणपूर्वक अभिवादन से योगी निरन्तर एक-दूसरे को जीवात्मा और परमात्मा के तादात्म्य का स्मरण कराते हैं। 'आदेश' का क्या उपदेश है, इस सम्बन्ध में महायोगी गोरखनाथ ने अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के चरण में जिज्ञासा की तो गुरु ने कहा-- सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६६