सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी वाणी में अनुभूतियुक्त हैं, अथवा सिद्ध पुरुषों द्वारा अथवा अपने ही द्वारा रचित स्तोत्र, सिद्धान्त आदि में पारंगत हैं, गायत्री मन्त्र के जप में तत्पर हैं, स्तोत्रादि का पाठ करते रहते हैं, शास्त्रार्थ में तत्पर रहते हैं, वे भी यथार्थ अखण्ड आत्मज्ञान--व्यष्टिपिण्ड और ब्रह्माण्ड में व्याप्त परमात्म स्वरूप को न जानकर खेद करते हैं तथा हाथ में दण्ड, कुल्हाड़ी, त्रिशूल, चक्र और लाठी आदि धारण करते हैं और मिथ्या स्वाँग बना कर विदूषक का आचरण करते हैं, वे भांड़ और दुष्ट हैं, क्योंकि यथार्थ अखण्ड स्वरूप में उनका प्रवेश नहीं हो पाता है ॥ ६१ ॥ एवं शून्यादिशून्यं परमपरपदं पञ्चशून्यादिशून्यं व्योमातीतं ह्यनाद्यं निजकुलमकुलं चाद्भुतं विश्वरूपम् । अव्यक्तं चान्तरालं निरुदयमपरं भासनिर्नाममैक्यं वाङ्मात्राद् भासयन्तोबहुविधमनसोव्याकुलाभ्रामितास्ते । ६२। ( महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि शून्यवादी केवल वाणी मात्र से शून्यवाद का प्रतिपादन कर और दूसरों के प्रति उसका कथन कर यथार्थ आत्म- तत्व का स्पर्श तक नहीं कर सकते हैं । ) शून्यादि शून्य परमपर पद पञ्च- शून्यादिशून्य है ( पाँच भूतों में पृथ्वी और जल में शून्य है, जल और तेज के मध्य में शून्य है, तेज और वायु के मध्य में शून्य है, वायु और आकाश के मध्य में शून्य है और आकाश शून्यरूप है ), व्योमातीत, अनादि, अकुल, कुल, अद्भुत, विश्वरूप, अव्यक्त, अन्तर्व्याप्त, ( सब में व्याप्त ), सूक्ष्म, उत्पत्तिरहित, नामरूप से रहित है--इस तरह वे केवल कथन करते रहते हैं और दूसरों को शून्यवाद का उपदेश देते हैं, ऐसे लोग मन में व्याकुल और भ्रमित रहते हैं, क्योंकि वे परमपद से वञ्चित रहते हैं ॥ ६२ ॥ आज्ञासिद्धिकरं सदा समुचितं सम्पूर्णभाभासकं पिण्डे सर्वगतं विधानममलं सिद्धान्तसारं वरम् । भ्रान्तेर्निर्हरणं सुखातिसुखदं कालान्तकं शाश्वतं तन्नित्यं कलनोज्झितं गुरुमयं ज्ञेय निरुत्थं पदम् । ६३। १६८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति