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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

'अवधू आदेस का अनूषम उपदेस' ( मच्छींद्र-गोरष-बोध-६ ) इसका तात्पर्य यह है कि आदेश सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मपद का प्रतिपादक परम उपदेश है । 'गोरखबानी' में 'रहरासि' नामक अत्यन्त लघु रचना में गोरखनाथजी का कथन है : 'ॐ आदेस आदेस अलष अतीतं' केन उपनिषद् में आदेश को परमात्मतत्व का सांकेतिक उपदेश स्वीकार किया गया है : 'तस्यैष आदेशो यदेतद्' ( केन उ० ४ । ४ ) श्रीगोरखनाथजी ने जोधपुराधीश महाराज मानसिंह को आदेश का स्वप्न में तत्त्वोपदेश दिया था-- नाथार्थोऽस्तु तवादेशो विदेशश्चास्तु वैरिणाम् । प्रदेशश्चास्तु भक्तानामुपदेशस्तु मे सदा ॥ नृसिंहोत्तरतापिनी-उपनिषद् में भी आदेश के सांकेतिक तत्वस्वरूप शान्त, अद्वैत शिवस्वरूप का प्रतिपादन हुआ है । 'अथ तस्यायमादेशी मात्रश्चतुर्थो व्यवहार्य प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वै त ॐकार आत्मैवसंविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ।' [ नृसिंहोत्तरतापिनी खण्ड २ ] आशादहनं भसितं कुण्डलयुगलं विचारसन्तोषः । कौपीनं स्थिरचित्तं खर्परमाकाशमात्मनो भजनम् । ६६। जिस योगी ने आशा-तृष्णा को जलाकर भस्मरूप कर दिया है, उसके अंग में तृष्णादहनरूप भस्म ही विभूति-धारण है, उसके कान के दोनों कुण्डलरूप में आत्मविचार और संतोष ही विशोभित हैं, स्थिरचित्त होना ही उसके द्वारा १७० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

कौपीन धारण है, हृदयाकाश में स्वरूप-चिन्तन ही उसके द्वारा हाथ में खर्पर का धारण है, आत्मा में अवस्थान—स्वरूपावस्थान ही उसके लिये भजन है, परमपद का वेध है। सिद्धसिद्धान्तरूप योगशास्त्र एतच्छास्त्रं महादिव्यं रहस्यं पारमेश्वरम् । सिद्धान्तं सर्वसारस्य नानासङ्केतनिर्णयम् । ९७ । सिद्धानां प्रकटं सिद्धं सद्यः प्रत्ययकारकम् । आत्मानन्दकरं नित्यं सर्वसन्देहनाशनम् । ६८ । न देयं परशिष्येभ्यो नान्येषां सन्निधौ पठेत् । न स्नेहान्नबलाल्लोभान्नमोहान्नाताच्छलात् । ६६ । न मैत्रो भावनाद्दानान्नसौन्दर्यान्न चासनात् । पुत्रस्यापि न दातव्यं गुरुशिष्यक्रमं विना । १०० । सिद्धसिद्धान्तरूप यह सत्योगशास्त्र महादिव्य है, अपने-आप में निगूढ़ रहस्य है, परमेश्वरस्वरूप है, समस्त तत्त्वों का एकमात्र सुनिश्चित सिद्धान्त है और अनेक तत्सम्बन्धी संकेतों का निश्चयात्मक निर्णय है, सिद्धों द्वारा प्रत्यक्ष किया गया महायोग ज्ञान है, स्वसंवेद्य पद — स्वरूपावस्थान में प्रतिष्ठित करनेवाला है, स्वरूपानन्द प्रदान करता है, यह नित्य, सनातन ज्ञान है, समस्त सन्देहों—तत्त्व के विषय में शंकाओं का उच्छेद करनेवाला है । इस योगशास्त्र का उपदेश उनको नहीं देना चाहिये, जो अन्य मार्गी हैं, इसका ऐसे लोगों के समक्ष पाठ तक नहीं करना चाहिये, जो दूसरे मत-मतान्तरों में भ्रमित हैं । किसी के प्रति अपार स्नेह हो, उसे भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । कोई बलपूर्वक अथवा लोभ दिखा कर अथवा मुग्ध कर अथवा छल प्रकट कर भी इसको ग्रहण करना चाहे, उसके लिये भी यह निषिद्ध है । मैत्री-भावना के वश होकर, किसी के रूप-सौन्दर्य या सत्कार से भी आकृष्ट होकर इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । अपने प्रिय पुत्र तक को भी इस योगज्ञान का उपदेश नहीं देना चाहिये, जब तक वह सिद्धमत की विधि से गुरुमन्त्र ग्रहण कर उपदेश प्राप्त करने का पात्र नहीं बन जाता है ॥ ६७—१०० ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७१

सत्यवन्तो दयाचित्ता दृढभक्ताः सदाचलाः । निस्तरङ्गा महाशान्ताः सदा ज्ञानप्रबोधकाः । १०१ । भयदैन्यघृणालज्जातृष्णाशोकविवर्जिताः । आलस्यमदमात्सर्यदम्भमायाच्छलोज्झिताः । १०२ । अहंकारमहामोहरागद्वेषपराङ्मुखाः । क्रोधेच्छाकामुकासूयाभ्रान्तिलोभविवर्जिताः । १०३ । निःस्पृहा निर्मला धीराः सदाऽद्वैतपदेरताः । तेभ्यो देयं प्रयत्नेन धूर्त्तानां गोपयेत्सदा । १०४ । जो सत्स्वरूप आत्मज्ञान का आदर करनेवाले सत्यवादी हैं, दूसरों के दुःख से द्रवित होनेवाले दयालु हैं, परमात्मा में श्रद्धा रखते हैं तथा अपने स्वरूप में अचल ( निष्ठा रखनेवाले ) हैं, जो इन्द्रियों और मन को वश में रखनेवाले शान्त और ज्ञान की चर्चा में रत रहते हैं, जो भय, दीनता, घृणा, लज्जा, तृष्णा, शोक आदि से रहित हैं, आलस्य, मद, मत्सर ( द्वेष ), दम्भ और दिखावट आदि से दूर हैं, जो अहंकार, मोह, राग, द्वेष आदि से रहित हैं, जिनमें क्रोध, कामुकता, परछिद्रान्वेषणवृत्ति ( दोष-दर्शन की प्रवृत्ति ), भ्रान्ति, लोभ आदि नहीं हैं, जो निःस्पृह, निर्मल चित्त वाले और योगसाधन में निष्ठावान् हैं तथा अखण्ड आत्मस्वरूप अद्वैतपद में स्थित हैं, उन्हीं को यह योगज्ञान प्रयत्नपूर्वक प्रदान करना चाहिये । धूर्तों से इस ज्ञान को गुप्त रखना चाहिये ।। १०१--१०४ ।। निन्दका ये दुराचाराश्चुम्बका गुरुतल्पगाः । नास्तिका ये शठाः क्रूरा विद्यावादरतास्तथा । १०५ । योगाचारपरिभ्रष्टाः ते निद्राकलहप्रियाः । स्वस्यकार्ये परानिष्ठा गुरुकार्येषु निःस्पृहाः । १०६ । एतान् विवर्जयेद् दूरे शिष्यत्वेनागतानपि । १०७ । सच्छास्त्रं सिद्धमार्गञ्च सिद्धसिद्धान्तपद्धतिः । न देयं सर्वदा तेभ्यो यदोच्छेच्चिरजीवनम् । १०८ । गोपनीयं प्रयत्नेन तस्करेभ्यो धनं यथा । १७२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

तेषां यो बोधयेन्मोहादपरीक्षितमन्दधीः । १०६ । नहि मुक्तिर्भवेत्तस्य सदा दुःखेन सीदतः । खेचरी भूचरी चैव शाकिनी च निशाचरी । ११० । एतासामद्भुतं शापः सिद्धानां भैरवस्य च । मस्तके तस्य पतति तस्माद् यत्नेन रक्षयेत् । १११ । जो योगमार्ग के निन्दक हैं, दुराचारी और कामुक हैं, गुरु के घर में निवास कर उसकी पत्नी आदि में कामासक्त हैं, जो वेदशास्त्र और परलोक में अनास्था रखनेवाले ( नास्तिक ) हैं, जो शठ, क्रूर और व्यर्थ वाद-विवाद में समय का दुरुपयोग करते हैं, जो अपने स्वार्थ-साधन में ही व्यस्त रहते हैं और गुरु द्वारा निर्दिष्ट कार्यों की अवहेलना करते हैं, यदि ऐसे लोग शिष्यत्व ग्रहण कर ज्ञानोपदेश प्राप्त करने के लिये शरणागत हों, तो इनको अपने पास नहीं आने देना चाहिये, दूर से ही ऐसे अश्रद्धालुओं का त्याग कर देना चाहिये । इनको सिद्धसिद्धान्त प्रक्रियारूप सिद्धमार्ग और सच्छास्त्र नहीं प्रदान करना चाहिये । यदि दीर्घकाल तक जीवित रहने की इच्छा हो तो इनसे सच्छास्त्र — सिद्धसिद्धान्त की उसी तरह रक्षा करनी चाहिये, जिस तरह चोरों से धन की रक्षा की जाती है । जो इन शिष्यों को मोहवश बिना परीक्षा लिये ( समझे ) ही मन्दबुद्धि गुरु-ज्ञान प्रदान करता है, वह मुक्ति नहीं प्राप्त करता और सदा दुखी रहता है । खेचरी, भूचरी, निशाचरी, शाकिनी आदि के शाप से ग्रस्त हो जाता है और सिद्ध है, तो भैरव का शाप उसके मस्तक पर पड़ता ही है, इसलिये यत्नपूर्वक महायोगज्ञान की रक्षा करनी चाहिये ॥ १०५—१११ ॥ गुरुपादाम्बुजस्थायपरीक्ष्य प्रवदेत्सदा । कुतो दुःखञ्च भोतिश्च तत्वज्ञस्य महात्मनः । ११२ । कृपयाैव प्रदातव्यं सम्प्रदायप्रवृत्तये । सम्प्रदायप्रवृत्तिर्हि सर्वेषां सम्मता यतः । ११३ । मायाशङ्करनाथाय सिद्धसिद्धान्तपद्धतिम् । लिखित्वा यः पठेत् भक्त्या स याति परमां गतिम् । ११४ । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७३

विद्धात्वर्थनिचयं भक्तानुग्रहमूर्तिमत् । स्मरानन्दभरं चेतो गाणपत्यभिधं महः । । ११५ । गुरु के चरणकमल में प्रणत शिष्य की अच्छी तरह परीक्षा कर ( कि वह ज्ञानोपदेश का सत्पात्र है ) उसे सिद्धसिद्धान्त—योगज्ञान प्रदान करना चाहिये, तत्वज्ञ महात्मा को न तो दुःख होता है, न किसी से शापित होने का भय ही रहता है । जो सिद्धमत में निष्ठा और आस्था रखता है, उसी को सत्सम्प्रदाय की रक्षा के लिये कृपापूर्वक योगोपदेश प्रदान करना चाहिये । सम्प्रदाय की प्रवृत्ति— रक्षा सर्वसम्मत है । जो शक्तिसहित शिव को प्रसन्न करने के लिये सिद्धसिद्धान्त पद्धति की रचना लिख कर श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है । भक्तों पर अनुग्रह करने वाले तथा स्मरण मात्र से ही चित्त में आनन्द का अनुभव करनेवाले गणपति नामक मूर्तिमान् तेज इस शास्त्र के अनुयायियों को चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ काम और मोक्ष से सम्पन्न करे ।। ११२-११५ ।। इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ षष्ठोपदेशः ॥ १७४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

नाथ निरंजन की आरती नाथ निरंजन आरती साजै । गुर के सबदूं झालरि बाजै ॥ टेक ॥ अनहद नाद गगन में गाजै । परम जोति तहां आप विराजै ॥ १ ॥ दीपक जोति अखंडत बाती । परम जोति जगै दिन राती ॥ २ ॥ सकल भवन उजियारा होई । देव निरंजन और न कोई ॥ ३ ॥ अनत कला जाकै पार न पावै । संष मृदंग धुनि बेनि बजावै ॥ ४ ॥ स्वाति बूंद लै कलस बंदाऊँ । निरति सुरति ले पहुप चढ़ाऊँ ॥ ५ ॥ निज तत नांव अमूरति मूरति । सब देवां सिरि उदबुदि सूरति ॥ ६ ॥ आदिनाथ नाती मच्छेन्द्रनाथ पूता । आरती करै गोरष अवधूता ॥ ७ ॥ [ गोरखबानी पद—६२ ]

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