सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्यवन्तो दयाचित्ता दृढभक्ताः सदाचलाः । निस्तरङ्गा महाशान्ताः सदा ज्ञानप्रबोधकाः । १०१ । भयदैन्यघृणालज्जातृष्णाशोकविवर्जिताः । आलस्यमदमात्सर्यदम्भमायाच्छलोज्झिताः । १०२ । अहंकारमहामोहरागद्वेषपराङ्मुखाः । क्रोधेच्छाकामुकासूयाभ्रान्तिलोभविवर्जिताः । १०३ । निःस्पृहा निर्मला धीराः सदाऽद्वैतपदेरताः । तेभ्यो देयं प्रयत्नेन धूर्त्तानां गोपयेत्सदा । १०४ । जो सत्स्वरूप आत्मज्ञान का आदर करनेवाले सत्यवादी हैं, दूसरों के दुःख से द्रवित होनेवाले दयालु हैं, परमात्मा में श्रद्धा रखते हैं तथा अपने स्वरूप में अचल ( निष्ठा रखनेवाले ) हैं, जो इन्द्रियों और मन को वश में रखनेवाले शान्त और ज्ञान की चर्चा में रत रहते हैं, जो भय, दीनता, घृणा, लज्जा, तृष्णा, शोक आदि से रहित हैं, आलस्य, मद, मत्सर ( द्वेष ), दम्भ और दिखावट आदि से दूर हैं, जो अहंकार, मोह, राग, द्वेष आदि से रहित हैं, जिनमें क्रोध, कामुकता, परछिद्रान्वेषणवृत्ति ( दोष-दर्शन की प्रवृत्ति ), भ्रान्ति, लोभ आदि नहीं हैं, जो निःस्पृह, निर्मल चित्त वाले और योगसाधन में निष्ठावान् हैं तथा अखण्ड आत्मस्वरूप अद्वैतपद में स्थित हैं, उन्हीं को यह योगज्ञान प्रयत्नपूर्वक प्रदान करना चाहिये । धूर्तों से इस ज्ञान को गुप्त रखना चाहिये ।। १०१--१०४ ।। निन्दका ये दुराचाराश्चुम्बका गुरुतल्पगाः । नास्तिका ये शठाः क्रूरा विद्यावादरतास्तथा । १०५ । योगाचारपरिभ्रष्टाः ते निद्राकलहप्रियाः । स्वस्यकार्ये परानिष्ठा गुरुकार्येषु निःस्पृहाः । १०६ । एतान् विवर्जयेद् दूरे शिष्यत्वेनागतानपि । १०७ । सच्छास्त्रं सिद्धमार्गञ्च सिद्धसिद्धान्तपद्धतिः । न देयं सर्वदा तेभ्यो यदोच्छेच्चिरजीवनम् । १०८ । गोपनीयं प्रयत्नेन तस्करेभ्यो धनं यथा । १७२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति