सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेषां यो बोधयेन्मोहादपरीक्षितमन्दधीः । १०६ । नहि मुक्तिर्भवेत्तस्य सदा दुःखेन सीदतः । खेचरी भूचरी चैव शाकिनी च निशाचरी । ११० । एतासामद्भुतं शापः सिद्धानां भैरवस्य च । मस्तके तस्य पतति तस्माद् यत्नेन रक्षयेत् । १११ । जो योगमार्ग के निन्दक हैं, दुराचारी और कामुक हैं, गुरु के घर में निवास कर उसकी पत्नी आदि में कामासक्त हैं, जो वेदशास्त्र और परलोक में अनास्था रखनेवाले ( नास्तिक ) हैं, जो शठ, क्रूर और व्यर्थ वाद-विवाद में समय का दुरुपयोग करते हैं, जो अपने स्वार्थ-साधन में ही व्यस्त रहते हैं और गुरु द्वारा निर्दिष्ट कार्यों की अवहेलना करते हैं, यदि ऐसे लोग शिष्यत्व ग्रहण कर ज्ञानोपदेश प्राप्त करने के लिये शरणागत हों, तो इनको अपने पास नहीं आने देना चाहिये, दूर से ही ऐसे अश्रद्धालुओं का त्याग कर देना चाहिये । इनको सिद्धसिद्धान्त प्रक्रियारूप सिद्धमार्ग और सच्छास्त्र नहीं प्रदान करना चाहिये । यदि दीर्घकाल तक जीवित रहने की इच्छा हो तो इनसे सच्छास्त्र — सिद्धसिद्धान्त की उसी तरह रक्षा करनी चाहिये, जिस तरह चोरों से धन की रक्षा की जाती है । जो इन शिष्यों को मोहवश बिना परीक्षा लिये ( समझे ) ही मन्दबुद्धि गुरु-ज्ञान प्रदान करता है, वह मुक्ति नहीं प्राप्त करता और सदा दुखी रहता है । खेचरी, भूचरी, निशाचरी, शाकिनी आदि के शाप से ग्रस्त हो जाता है और सिद्ध है, तो भैरव का शाप उसके मस्तक पर पड़ता ही है, इसलिये यत्नपूर्वक महायोगज्ञान की रक्षा करनी चाहिये ॥ १०५—१११ ॥ गुरुपादाम्बुजस्थायपरीक्ष्य प्रवदेत्सदा । कुतो दुःखञ्च भोतिश्च तत्वज्ञस्य महात्मनः । ११२ । कृपयाैव प्रदातव्यं सम्प्रदायप्रवृत्तये । सम्प्रदायप्रवृत्तिर्हि सर्वेषां सम्मता यतः । ११३ । मायाशङ्करनाथाय सिद्धसिद्धान्तपद्धतिम् । लिखित्वा यः पठेत् भक्त्या स याति परमां गतिम् । ११४ । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७३