सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्धात्वर्थनिचयं भक्तानुग्रहमूर्तिमत् । स्मरानन्दभरं चेतो गाणपत्यभिधं महः । । ११५ । गुरु के चरणकमल में प्रणत शिष्य की अच्छी तरह परीक्षा कर ( कि वह ज्ञानोपदेश का सत्पात्र है ) उसे सिद्धसिद्धान्त—योगज्ञान प्रदान करना चाहिये, तत्वज्ञ महात्मा को न तो दुःख होता है, न किसी से शापित होने का भय ही रहता है । जो सिद्धमत में निष्ठा और आस्था रखता है, उसी को सत्सम्प्रदाय की रक्षा के लिये कृपापूर्वक योगोपदेश प्रदान करना चाहिये । सम्प्रदाय की प्रवृत्ति— रक्षा सर्वसम्मत है । जो शक्तिसहित शिव को प्रसन्न करने के लिये सिद्धसिद्धान्त पद्धति की रचना लिख कर श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है । भक्तों पर अनुग्रह करने वाले तथा स्मरण मात्र से ही चित्त में आनन्द का अनुभव करनेवाले गणपति नामक मूर्तिमान् तेज इस शास्त्र के अनुयायियों को चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ काम और मोक्ष से सम्पन्न करे ।। ११२-११५ ।। इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ षष्ठोपदेशः ॥ १७४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति